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प्रश्न
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उत्तर
कुश्ती के दौरान ढोल की ध्वनि और लुट्टन के दाँव-पेंचों में गुरु-शिष्य जैसा गहरा तालमेल दिखाई देता था। ढोलक की हर थाप से लुट्टन को कुछ नया सीखने और समझने का अवसर मिलता था। ढोल की आवाज़ से मन में उत्साह भर जाता है और शरीर में नई ऊर्जा और जोश का संचार हो जाता है।
चट्ट धा, गिर धा .......... आ जा भीड़ जा
चटाक्क चट्ट धा .......... उठाकर पटक दे
ढाक्क ढिना .......... वाह पट्ठे
चट्ट गिड धा .......... मत डरना
धिक धिना .......... चित करो
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