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प्रश्न
मनुष्य किसी अन्य को अनाथ समझने की भूल कब कर बैठता है?
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उत्तर
यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि धन आते ही उसके मन में घमंड का भाव आ जाता है। वह अहंकार पूर्ण बातें और आचरण करने लगता है। धन देखकर कुछ लोग उसकी चाटुकारिता करने लगते हैं। ऐसे में वह धनवान व्यक्ति खुद को बलशाली समझने लगता है। धन और बल का मेल होते ही वह अनैतिक आचरण पर उतर आता है। वह दूसरों को अपने से कमजोर और अनाथ समझने लगता है।
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(क) निरन्वय
(ख) समन्वय
(ग) क्रमान्वय
(घ) दूरान्वय - अभीष्ट मार्ग से तात्पर्य है-
(क) स्वर्गगत मार्ग
(ख) प्रमाणित मार्ग
(ग) क्रीड़ाक्षेत्रीय मार्ग
(घ) मनोवांछित मार्ग - समर्थ भाव है, दूसरों को
(क) सफल करते हुए स्वयं सफल होना
(ख) ज्ञान मार्ग बताते हुए सफल बनाना
(ग) शक्ति प्रदर्शन द्वारा सफलता दिलाना
(घ) सफल करते हुए अपना स्वार्थ सिद्ध करना - 'भिन्नता ना बढ़े' का आशय है-
(क) मत भिन्नता हो
(ख) मतभेद कम हों
(ग) भेदभाव भिन्न हों
(घ) मतभेद अधिक हों - निम्नलिखित वाक्यों को ध्यानपूर्वक पढ़िए-
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- मार्ग की विपत्तियों को ढकेलते हुए आगे बढ़ना चाहिए।
- प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए।
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पदयांश से मेल खाते वाक्यों के लिए उचित विकल्प चुनिए -
(क) (i), (ii), (v)
(ख) (i), (iii), (v)
(ग) (ii), (iii), (iv)
(घ) (ii), (iv), (v)
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