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Question
व्याख्या कीजिये
अट्टालिका नहीं है रे
आतंक-भवन
सदा पंक पर ही होता
जल-विलप्व-प्लावन
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Solution
संदर्भ - प्रस्तुत काव्यांश पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित ‘बादल राग’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इसके रचनाकार महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी हैं।
प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश में कवि ने पूँजीपति वर्ग के भोग-विलासपूर्ण जीवन पर व्यंग्य किया है। उनका मत है कि क्रांति का प्रभाव सदैव शोषक तथा पूँजीपति वर्ग पर पड़ता है। केवल क्रांति ही शोषक और शोषित के बीच के भेद को समाप्त कर सकती है।
व्याख्या - कवि क्रांति के प्रतीक बादल को संबोधित करते हुए कहता है कि हे क्रांति के अग्रदूत बादल! पूँजीपतियों के ये ऊँचे-ऊँचे और भव्य भवन अब तेरी क्रांति के कारण सुख-सुविधाओं के महल नहीं रह गए हैं, बल्कि गरीबों को भयभीत करने वाले भवन बन गए हैं। तुम्हारी क्रांतिकारी गर्जना को सुनकर ये पूँजीपति अपने महलों में रहते हुए भी आतंकित हो उठते हैं। उन्हें हर समय यह आशंका बनी रहती है कि कहीं क्रांति की विनाशकारी गर्जना उन्हें नष्ट न कर दे। जिस प्रकार बाढ़ का सबसे अधिक विनाशकारी प्रभाव कीचड़ पर पड़ता है, उसी प्रकार क्रांति का प्रहार भी बुराई रूपी कीचड़ अर्थात् शोषण करने वाले पूँजीपति वर्ग पर ही होता है।
विशेष -
- कवि ने निम्न वर्ग के प्रति सहानुभूति तथा शोषक वर्ग के प्रति घृणा का भाव व्यक्त किया है।
- भाषा खड़ी बोली है, जिसमें तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है।
- प्रतीकात्मक शैली का सुंदर प्रयोग किया गया है।
- ‘पंक पर’ में अनुप्रास अलंकार विद्यमान है।
- मुक्तक छंद का प्रयोग हुआ है।
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