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प्रश्न
तुम्हें रुपयों से भरा बटुआ मिल जाए तो .....
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उत्तर
यदि मुझे रुपयों से भरा बटुआ मिल जाए तो सबसे पहले मैं आस-पास के किसी बड़े व्यक्ति को इसके बारे में बताऊँगा। यदि कोई नहीं मिला तो मैं स्वयं उस बटुए को उठाकर वहाँ खड़े लोगों से पूछूँगा। उपस्थित लोगों में से किसी का बटुआ होगा तो उसे दे दूँगा। मैं यह देखने का प्रयास करूँगा कि कोई कुछ खोजने की अवस्था में है क्या।अगर ऐसा कोई व्यक्ति मिला, तो उस व्यक्ति से बटुए से मिलते - जुलते कुछ सवाल पुछूँगा । उस व्यक्ति के उत्तर सही हुए तो मैं उसे वह बटुआ दे दूँगा। फिर भी अगर बटुए का सही मालिक नहीं मिला, तो मैं उस बटुए को घर ले जाऊँगा और माता-पिता को सारी घटना बताते हुए उन्हें वह बटुआ दे दूँगा।
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| ध्या | द | चं | न | ||||
| व | शा | ध | जा | बा | खा | ||
| ह | ल्खा | सिं | मि | ||||
| म | री | काॅ | मे | ||||
| नि | मि | सा | र्जा | या | |||
| न | र | स | ल | डु | तें | क | चि |
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।। स्वतंत्रता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है।।
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| “कोई काम छोटा नहीं। कोई काम गंदा नहीं। कोई भी काम नीचा नहीं। कोई काम असंभव भी नहीं कि व्यक्ति ठान ले और ईश्वर उसकी मदद न करे। शर्त यही है कि वह काम, काम का हो। किसी भी काम के लिए ‘असंभव’, ‘गंदा’ या ‘नीचा’ शब्द मेरे शब्दकोश में नहीं है।” ऐसी वाणी बोलने वाली मदर टेरेसा को कोढ़ियों की सेवा करते देखकर एक बार एक अमेरिकी महिला ने कहा, “मैं यह कभी नहीं करती।” मदर टेरेसा के उपरोक्त संक्षिप्त उत्तर से वह महिला शर्म से सिकुड़ गई थी। सचमुच ऐसे कार्य का मूल्य क्या धन से आँका जा सकता है या पैसे देकर किसी की लगन खरीदी जा सकती है? यह काम तो वही कर सकता है, जो ईश्वरीय आदेश समझकर अपनी लगन इस ओर लगाए हो। जो गरीबों, वंचितों, जरूरतमंदों में ईश्वरीय उपासना का मार्ग देखता हो और दुखी मानवता में उसके दर्शन करता हो। ईसा, गांधी, टेरेसा जैसे परदुखकातर, निर्मल हृदयवाले लोग ही कोढ़ियों और मरणासन्न बीमारों की सेवा कर सकते हैं और ‘निर्मल हृदय’ जैसी संस्थाओं की स्थापना करते हैं। |
