Advertisements
Advertisements
Question
Advertisements
Solution
तुलसीदास के समय में संपन्न और धनवान लोग गरीब परिवारों के बच्चों को दास के रूप में खरीद लिया करते थे। उस युग में आर्थिक असमानता, सामाजिक पिछड़ापन, कठोर वर्ण-व्यवस्था और जातिवाद जैसी समस्याएँ व्यापक रूप से विद्यमान थीं। वर्तमान समय में भी अत्यधिक गरीबी, बेरोजगारी और जीविका के संकट के कारण कुछ निर्धन परिवार अपनी संतानों को बेचने के लिए विवश हो जाते हैं। बंधुआ मजदूरी इसी प्रकार के शोषण का एक उदाहरण है। यद्यपि आज की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ पहले की अपेक्षा काफी बदल चुकी हैं, फिर भी कर्ज के बोझ, गरीबी और भुखमरी के कारण किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने की घटनाएँ आज भी गंभीर चिंता का विषय बनी हुई हैं।
APPEARS IN
RELATED QUESTIONS
कवितावली में उद्धृत छंदों के आधार पर स्पष्ट करें कि तुलसीदास को अपने युग की आर्थिक विषमता की अच्छी समझ है।
तुलसी ने यह कहने की ज़रूरत क्यों समझी?
धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ/काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ। इस सवैया में काहू के बेटासों बेटी न ब्याहब कहते तो सामाजिक अर्थ में क्या परिवर्तन आता?
धूत कहौ... वाले छंद में ऊपर से सरल व निरीह दिखलाई पड़ने वाले तुलसी की भीतरी असलियत एक स्वाभिमानी भक्त हृदय की है। इससे आप कहाँ तक सहमत हैं?
व्याख्या करें-
माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबको दोऊ।।
व्याख्या करें-
ऊँचे नीचे करम, धरम-अधरम करि, पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी।।
‘कवितावली’ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि तुलसीदास को अपने समय की आर्थिक-सामाजिक समस्याओं की समझ थी।
