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लेखक क्यों मानता है कि स्वार्थ से भी बढ़कर जिजीविषा से भी प्रचंड कोई न कोई शक्ति अवश्य है? उदाहरण सहित उत्तर दीजिए।

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Question

लेखक क्यों मानता है कि स्वार्थ से भी बढ़कर जिजीविषा से भी प्रचंड कोई न कोई शक्ति अवश्य है? उदाहरण सहित उत्तर दीजिए।
Very Long Answer
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Solution

स्वार्थ हमें गलत दिशाओं की ओर ले जाता है। इसी स्वार्थ के कारण मनुष्य ने ऊँची-ऊँची इमारतें बनाई हैं। नदियों पर विशाल पुल बनाए, समुद्र में चलने वाले बड़े जहाज बनाए और आकाश में उड़ने वाले विमान बनाए हैं। हमारे स्वार्थ की कोई सीमा नहीं होती। जिजीविषा के कारण ही हम जीवन जीने के लिए प्रेरित होते हैं। लेकिन स्वार्थ और जिजीविषा ही हमें गलत मार्ग पर ले जाते हैं। इन दोनों के कारण हम स्वयं को ही सर्वोपरि मान लेते हैं और भूल जाते हैं कि हम क्या कर रहे हैं। लेखक इन दोनों से भिन्न एक शक्ति को स्वीकार करता है। उसके अनुसार ‘सर्व’ वह शक्ति है जो सबसे बड़ी है। जब मनुष्य इस सर्व शक्ति को स्वीकार करता है, तो वह केवल मानव जाति ही नहीं बल्कि पृथ्वी की सभी प्रजातियों का कल्याण करता है। कल्याण की भावना ही उसे महान बनाती है। यह शक्ति इतनी प्रबल होती है कि मनुष्य को दृढ़ और नि:स्वार्थ बना देती है। उसमें अहंकार, लोभ-लालच, स्वार्थ, क्रोध आदि भावनाएँ समाप्त हो जाती हैं। इससे जो व्यक्तित्व उभरता है, वही महान कहलाता है।

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कुटज
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Chapter 2.08: हजारी प्रसाद द्विवेदी (कुटज) - प्रश्न-अभ्यास [Page 137]

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NCERT Hindi Antara Bhag 2 Class 12
Chapter 2.08 हजारी प्रसाद द्विवेदी (कुटज)
प्रश्न-अभ्यास | Q 8. | Page 137

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‘नाम’ क्यों बड़ा है? लेखक के विचार अपने शब्दों में लिखिए।


‘कुट’, ‘कुटज’ और ‘कुटनी’ शब्दों का विश्लेषण कर उनमें आपसी संबंध स्थापित कीजिए।


कुटज किस प्रकार अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा करता है?


‘कुटज’ हम सभी को क्या उपदेश देता है? टिप्पणी कीजिए।


कुटज के जीवन से हमें क्या सीख मिलती है?


कुटज क्या केवल जी रहा है - लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमज़ोरियों पर टिप्पणी की है?


‘कुटज’ पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि ‘दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं।’

निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-

‘कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़ें काफ़ी गहरी पैठी रहती हैं। ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतल गह्हर से अपना भोग्य खींच लाते हैं।’


निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-

‘रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य। नाम उस पद को कहते हैं जिस पर समाज की मुहर लगी होती है। आधुनिक शिक्षित लोग जिसे ‘सोशल सैक्शन’ कहा करते हैं। मेरा मन नाम के लिए व्याकुल है, समाज द्वारा स्वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाणित, समष्टि-मानव की चित्त-गंगा में स्नात!’


निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-

‘रूप की तो बात ही क्या है! बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर कुपित यमराज के दारुण निःश्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है, दुर्जन के चित्त से भी अधिक कठोर पाषाण की कारा में रुद्ध अज्ञात जलस्रोत से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है।’


निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-

‘हृदयेनापराजितः! कितना विशाल वह हृदय होगा जो सुख से, दुख से, प्रिय से, अप्रिय से विचलित न होता होगा! कुटज को देखकर रोमांच हो आता है। कहाँ से मिलती है यह अकुतोभया वृत्ति, अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन दृष्टि!’


कुटज को ‘गाढ़े का साथी’ क्यों कहा गया है?


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