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प्रश्न
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उत्तर
स्वार्थ हमें गलत दिशाओं की ओर ले जाता है। इसी स्वार्थ के कारण मनुष्य ने ऊँची-ऊँची इमारतें बनाई हैं। नदियों पर विशाल पुल बनाए, समुद्र में चलने वाले बड़े जहाज बनाए और आकाश में उड़ने वाले विमान बनाए हैं। हमारे स्वार्थ की कोई सीमा नहीं होती। जिजीविषा के कारण ही हम जीवन जीने के लिए प्रेरित होते हैं। लेकिन स्वार्थ और जिजीविषा ही हमें गलत मार्ग पर ले जाते हैं। इन दोनों के कारण हम स्वयं को ही सर्वोपरि मान लेते हैं और भूल जाते हैं कि हम क्या कर रहे हैं। लेखक इन दोनों से भिन्न एक शक्ति को स्वीकार करता है। उसके अनुसार ‘सर्व’ वह शक्ति है जो सबसे बड़ी है। जब मनुष्य इस सर्व शक्ति को स्वीकार करता है, तो वह केवल मानव जाति ही नहीं बल्कि पृथ्वी की सभी प्रजातियों का कल्याण करता है। कल्याण की भावना ही उसे महान बनाती है। यह शक्ति इतनी प्रबल होती है कि मनुष्य को दृढ़ और नि:स्वार्थ बना देती है। उसमें अहंकार, लोभ-लालच, स्वार्थ, क्रोध आदि भावनाएँ समाप्त हो जाती हैं। इससे जो व्यक्तित्व उभरता है, वही महान कहलाता है।
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