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कुटज क्या केवल जी रहा है - लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमज़ोरियों पर टिप्पणी की है?

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प्रश्न

कुटज क्या केवल जी रहा है - लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमज़ोरियों पर टिप्पणी की है?

दीर्घउत्तर
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उत्तर

‘कुटज’ क्या केवल जी रहा है – लेखक ने इस प्रश्न के माध्यम से मानवीय कमजोरियों पर प्रहार किया है। स्वार्थ के कारण मनुष्य अपनी उन्नति के लिए अधिकारियों की चापलूसी करता है और उनकी खुशामद में लगा रहता है। आत्मोन्नति के लिए वह रूढ़ियों तथा अंधविश्वासों, जैसे उन्नति हेतु नीलम आदि रत्नों को अंगूठियों की माला पहनने जैसी बातों का सहारा लेता है। ‘कुटज’ मनुष्य को स्वार्थ की सीमा से बाहर निकलने का मार्ग दिखाता है। सूखी चट्टानों के बीच खिला हुआ कुटज नीरस वातावरण को बिना स्वार्थ के आनंदमय बना देता है। वह मनुष्यों की तरह दुर्बलताओं के बंधन में नहीं रहता।

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कुटज
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अध्याय 2.08: हजारी प्रसाद द्विवेदी (कुटज) - प्रश्न-अभ्यास [पृष्ठ १३७]

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एनसीईआरटी Hindi Antara Bhag 2 Class 12
अध्याय 2.08 हजारी प्रसाद द्विवेदी (कुटज)
प्रश्न-अभ्यास | Q 7. | पृष्ठ १३७

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निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-

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निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-

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निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-

‘हृदयेनापराजितः! कितना विशाल वह हृदय होगा जो सुख से, दुख से, प्रिय से, अप्रिय से विचलित न होता होगा! कुटज को देखकर रोमांच हो आता है। कहाँ से मिलती है यह अकुतोभया वृत्ति, अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन दृष्टि!’


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