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Question
कुटज किस प्रकार अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा करता है?
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Solution
‘कुटज’ अपने ‘रूप’ और ‘नाम’ दोनों के कारण अजेय जीवन-शक्ति का संदेश देता है। हिमालय पर यमराज के कठोर श्वास जैसे धधकते पहाड़ों में भी हरा-भरा तथा पुष्पित कुटज अपनी मस्ती और मनमोहक शोभा में जीवित रहता है। वह पत्थरों से अज्ञात जल-स्रोत का रस ग्रहण करके सदा रसयुक्त बना रहता है। ‘कुटज’ जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहने की प्रेरणा देने का संदेश देता है। वह विपरीत और प्रतिकूल परिस्थितियों का डटकर सामना करना सिखाता है। इस प्रकार कुटज अपनी अजेय जीवन-शक्ति की घोषणा करता है।
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‘नाम’ क्यों बड़ा है? लेखक के विचार अपने शब्दों में लिखिए।
‘कुट’, ‘कुटज’ और ‘कुटनी’ शब्दों का विश्लेषण कर उनमें आपसी संबंध स्थापित कीजिए।
‘कुटज’ हम सभी को क्या उपदेश देता है? टिप्पणी कीजिए।
कुटज के जीवन से हमें क्या सीख मिलती है?
कुटज क्या केवल जी रहा है - लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमज़ोरियों पर टिप्पणी की है?
निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
‘कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़ें काफ़ी गहरी पैठी रहती हैं। ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतल गह्हर से अपना भोग्य खींच लाते हैं।’
निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
‘रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य। नाम उस पद को कहते हैं जिस पर समाज की मुहर लगी होती है। आधुनिक शिक्षित लोग जिसे ‘सोशल सैक्शन’ कहा करते हैं। मेरा मन नाम के लिए व्याकुल है, समाज द्वारा स्वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाणित, समष्टि-मानव की चित्त-गंगा में स्नात!’
निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
‘रूप की तो बात ही क्या है! बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर कुपित यमराज के दारुण निःश्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है, दुर्जन के चित्त से भी अधिक कठोर पाषाण की कारा में रुद्ध अज्ञात जलस्रोत से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है।’
निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
‘हृदयेनापराजितः! कितना विशाल वह हृदय होगा जो सुख से, दुख से, प्रिय से, अप्रिय से विचलित न होता होगा! कुटज को देखकर रोमांच हो आता है। कहाँ से मिलती है यह अकुतोभया वृत्ति, अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन दृष्टि!’
कुटज को ‘गाढ़े का साथी’ क्यों कहा गया है?
