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कवि ने कठिन यथार्थ के पूजन की बात क्यों कही है?

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Question

कवि ने कठिन यथार्थ के पूजन की बात क्यों कही है?

Short/Brief Note
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Solution

यथार्थ मनुष्य जीवन के संघर्षों का कड़वा सच है। हम यदि जीवन की कठिनाइयों व दु:खों का सामना न कर उनको अनदेखा करने का प्रयास करेंगे तो हम स्वयं किसी मंजिल को प्राप्त नहीं कर सकते। बीते पलों की स्मृतियों को अपने से चिपकाके रखना और अपने वर्तमान से अंजान हो जाना मनुष्य के लिए मात्र समय की बर्बादी के अलावा और कुछ नहीं है। अपने जीवन में घट रहे कड़वे अनुभवों व मुश्किलों से दृढ़तापूर्वक लड़ना ही मनुष्य का प्रथम कर्त्तव्य है अर्थात् जीवन की कठिनाइयों को यथार्थ भाव से स्वीकार उनसे मुँह न मोड़कर उसके प्रति सकारात्मक भाव से उसका सामना करना चाहिए। तभी स्वयं की भलाई की ओर एक कदम उठाया जा सकता है, नहीं तो सब मिथ्या ही है। इसलिए कवि ने यथार्थ के पूजन की बात कही है।

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छाया मत छूना
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भाव स्पष्ट कीजिए -

प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्णा है,

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कविता में विशेषण के प्रयोग से शब्दों के अर्थ में विशेष प्रभाव पड़ता है, जैसे कठिन यथार्थ। कविता में आए ऐसे अन्य उदाहरण छाँटकर लिखिए और यह भी लिखिए कि इससे शब्दों के अर्थ में क्या विशिष्टता पैदा हुई?


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कविता में व्यक्त दुख के कारणों को स्पष्ट कीजिए।


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कवि ‘छाया’ छूने से क्यों मना करता है?


कवि के जीवन की कौन-सी यादें उसे दुखी कर रही हैं?


‘भूली-सी एक छुअन बनता हर जीवित क्षण’ से कवि का क्या आशय है?


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प्रभुता की कामना को मृगतृष्णा क्यों कहा गया है?


'छाया मत छूना’ कविता के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहता है?
अथवा
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