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Question
ऐरिल हैलाइड ऐल्किल हैलाइडों की अपेक्षा नाभिकरागी प्रतिस्थापन के प्रति कम क्रियाशील क्यों होते हैं? हम ऐरिल हैलाइडों की क्रियाशीलता कैसे बढ़ा सकते हैं?
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Solution
ऐरिल हैलाइड नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के प्रति निम्नलिखित कारणों से कम क्रियाशील होते हैं।
(i) हैलोऐरीन में हैलोजन परमाणु पर उपस्थित एकाकी इलेक्ट्रॉन युगल वलय के π इलेक्ट्रॉनों के साथ संयुग्मन में होते हैं तथा निम्नलिखित अनुनादी संरचनाएँ संभव हैं।

अनुनाद के कारण C-Cl आबंध में आंशिक द्विबंध के गुण आ जाते हैं। जिसके परिणामस्वरूप हैलोऐल्केन की तुलना में हैलोरीन में आबंध विदलन अपेक्षाकृत कठिन होता है। अत: ये नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के प्रति कम क्रियाशील होती हैं।
(ii) हैलोऐल्केन में हैलोजन से जुड़ा कार्बन परमाणु sp3 संकरित होता हैं जबकि हैलोऐरीन में हैलोजन परमाणु से जुड़ा कार्बन परमाणु sp2 संकरित होता है।

अधिक s गुणयुक्त sp2 संकरित कार्बन अधिक विद्युतऋणात्मक होता है तथा हैलोऐल्केन में कम s गुण युक्त sp3 संकरित कार्बन परमाणु की तुलना में C-X आबंध के इलेक्ट्रॉन युगल को अपेक्षाकृत अधिक सुदृढ़ता से थाम सकता है।अतः हैलोऐल्केन में C-Cl आबंध की लंबाई 177 pm, है जबकि हैलोऐरीन में 169 pm है। चूँकि लंबे बंध की तुलना में छोटे बंध को तोड़ना कठिन होता है, अतः नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रिया में हैलोऐल्केनों की तुलना में हैलोऐरीन कम क्रियाशील होते हैं।
(iii) स्वआयनन के फलस्वरूप हैलोऐरीनों से बना फेनिल धनायन अनुनाद के द्वारा स्थायी नहीं हो पाएगा। अतः SN1 क्रियाविधि की संभावना समाप्त हो जाती है।

(iv) संभावित प्रतिकर्षण के कारण इलेक्ट्रॉनधनी नाभिकरागी के इलेक्ट्रॉनधनी ऐरीन की ओर जाने की संभावना कम होती है।
क्रियाशीलता को कैसे बढ़ाएँ:
ऑर्थो- तथा पैरा-स्थिति पर इलेक्ट्रॉन-अपनयक समूह (−NO2) उपस्थित होने पर हैलोऐरीन की क्रियाशीलता बढ़ जाती है।
जब −NO2 समूह ऑर्थो- तथा पैरा-स्थितियों पर जुड़ा होता है, तब यह प्रभाव अधिक प्रबल होता है। तथापि, इलेक्ट्रॉन अपनयक समूह के मैटा-स्थिति पर जुड़े होने की स्थिति में हैलोएरीनों की अभिक्रियाशीलता पर कोई प्रभाव प्रेक्षित नहीं होता है। अभिक्रिया की क्रियाविधि को निम्न प्रकार से आरेखित किया जा सकता है।

जैसा कि दर्शाया गया है, कि ऑर्थो- तथा पैरा-स्थिति पर नाइट्रो समूह को उपस्थिति से बेन्जीन वलय पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है। फलत: हैलोऐरीन पर नाभिकरागी का आक्रमण सरल हो जाता है।इस प्रकार बना कार्बऐनायन अनुनाद के द्वारा स्थायित्व प्राप्त कर लेता है। हैलोजन प्रतिस्थापी के स्थान से ऑर्थो- एवं पैरा-स्थितियों पर स्थित कार्बनों पर उत्पन्न ऋणावेश −NO2 के द्वारा स्थायित्व प्राप्त कर लेता है जबकि m-नाइट्रोक्लोरबेन्जीन में एक भी संरचना इस प्रकार की नहीं होती जिसमें −NO2 समूह कीउपस्थिति वाले कार्बन परमाणु पर ऋणावेश हो। अतः मेटा- स्थिति पर उपस्थित नाइट्रो समूह ऋणावेश को स्थायित्व प्रदान नहीं करता तथा मेटा- स्थिति पर उपस्थित −NO2 समूह का अभिक्रियाशीलता पर कोई प्रभाव प्रेक्षित नहीं होता।
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निम्नलिखित कथनों में से कौन-से कथन उपरोक्त अभिक्रिया के लिए सही हैं?
(i) अभिक्रिया SN2 क्रियाविधि का अनुसरण करती है।
(ii) (b) और (d) का विन्यास एक दूसरे के विपरीत है।
(iii) (b) और (d) का विन्यास समान है।
(iv) अभिक्रिया SN1 क्रियाविधि का अनुसरण करती है।

अभिक्रिया माध्यमिक के लिए निम्नलिखित में से कोन-से कथन सही हैं?
(i) माध्यमिक (c) अस्थायी है क्योंकि इसमें कार्बन पाँच परमाणुओं से जुड़ा है।
(ii) माध्यमिक (c) अस्थायी है क्योंकि इसमें कार्बन परमाणु sp2 संकरित है।
(iii) माध्यमिक (c) स्थायी है क्योंकि इसमें कार्बन परमाणु sp2 संकरित है।
(iv) माध्यमिक (c) अभिक्रियक (b) से कम स्थायी है।
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| (क) | (ख) |
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कॉलम I और कॉलम II के मदों को सुमेलित कीजिए।
| कॉलम I | कॉलम II |
| (i) SN1 अभिक्रिया | (a) विस-डाइब्रोमाइड |
| (ii) अग्निशामक में रसायन | (b) जेम-डाइहैलाइड |
| (iii) ऐल्कीनों का ब्रोमीनन | (c) रेसिमीकरण |
| (iv) ऐल्किलिडीन हैलाइड | (d) सेत्जेफ नियम |
| (v) ऐल्किल हैलाइड से HX का निकलना | (e) क्लोरोब्रोमोकार्बन |
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