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प्रश्न
निम्नलिखित विषय पर लगभग 120 शब्दों में सारगर्भित अनुच्छेद लिखिए-
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय
संकेत-बिंदु-
- दूसरों की कमियाँ देखना स्वाभाविक प्रवृत्ति
- इस प्रवृत्ति का समाज पर प्रभाव
- अपने अंदर झाँकना आवश्यक
- आत्मनिरीक्षण का संकल्प
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उत्तर
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय
संत कबीर दास एक महान समाज सुधारक कवि थे। उनके दोहों में जीवन की सच्चाई के दर्शन होते हैं। उन्होंने अपने दोहे 'बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिय कोय' के माध्यम से कहा कि जब मैंने संसार में बुरे लोगों की खोज की तो कोई नहीं मिला और अंततः अपनी अंतरात्मा में झाँकने पर इस संसार में मुझसे अधिक बुरा कोई नहीं था। आशय यह हैं जब व्यक्ति स्वयं से साक्षात्कार करता है तो उसे ज्ञात होता है कि अच्छाई और बुराई अंदर ही होती है; उसे बाहर खोजने की कोई आवश्यकता नहीं है। मानव स्वभाव से अंतरमुखी कम और बहिर्मुखी अधिक होता है इसीलिए अपनी अंतरात्मा में झाँकने की अपेक्षा और दूसरों के अवगुणों की ओर अधिक ध्यान देता है। प्राय: मनुष्य अपने आप को श्रेष्ठ समझता है और दूसरों को हीन। दूसरों की बुराई ढूँढ़ना या दोष देखना सज्जनों का कार्य नहीं है। दूसरों की बुराई देखने को प्रवृत्ति के कारण मनुष्य अपने प्रियजनों से दूर होता जाता है। इस प्रवृत्ति के कारण मित्रों में भी परस्पर मतभेद उत्पन्न होता है जिससे वैमनस्य बढ़ता हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम दूसरों के अवगुणों को देखने की अपेक्षा अपनी कमियों को जानकर उन्हें दूर करने का प्रयत्न करें। व्यक्ति को आत्मचिंतन की प्रवृत्ति विकसित करना चाहिए। इससे दूसरे के दोष देखने की प्रवृत्ति भी खत्म होने लगती है। इसका लाभ यह होता है कि मनुष्य धीरे--धीरे अवगुणों को त्याग कर सदगुणों को ग्रहण करने की प्रवृत्ति में संलग्न हो जाता है। यह भावना उसे पवित्र बना देती है। विवेकशील और ज्ञानी लोग दूसरों की अच्छाई और सदगुणों के दर्शन करके उन्हें अपनाने का प्रयास करते हैं। महापुरुषों में यहीं प्रवृत्ति देखने को मिलती है।
Notes
- विषयवस्तु - 4 अंक
- भाषा - 1 अंक
- प्रस्तुति - 1 अंक
