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प्रश्न
निम्नलिखित विषय पर 80 से 100 शब्दों में निबंध लिखिए:
नदी की आत्मकथा
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उत्तर
नदी की आत्मकथा
मैं नदी हूँ। मुझे विविध नामों से संबोधित किया जाता है। जैसे सरिता, तटिनी, नहर, प्रवाहिनी आदि। मैं कल-कल करके बहती रहती हूँ। मैं पहाड़ों में पैदा हुए नीर का एक स्रोत हूँ। पर्वतों से झरनों के रूप में मैं आगे बढ़ती हूँ। आगे बहते हुए सागर में जा मिलती हूँ। प्रकृति ने मुझे प्राणियों के उद्धार के लिए बनाया है। पहाड़ों से निकलते समय मेरा रूप छोटा होता है। जैसे-जैसे आगे बढ़ती हूँ, मैं बड़ी और चौड़ी होती जाती हूँ। समुद्र में जाकर मिलने से पहले आसपास की जमीन को हरा-भरा कर देती हूँ। इतना ही नहीं, इसके अलावा भी कई जीव मुझमें पनपते हैं और मुझमें रहते हैं और अपने जीवन का संचालन करते हैं।
समुद्र में मिलने से पहले और पहाड़ों से निकलने के बाद मुझे काफी मशक्कत करनी पड़ती है। मेरे सामने आयी अनेक बाधाओं का धैर्यपूर्वक सामना करते हुए मैं आगे बढ़ती हूँ। पत्थर, चट्टान, छोटे और बड़े कंकड़ मेरे बहाव में रोधक हैं, परंतु उन्हें पार करते हुए मैं अपना मार्ग निकाल लेती हूँ।
मेरी उपयोगिता मानव और पशु-पक्षियों के लिए बहुत अधिक है। मेरे पानी का उपयोग खेतों की सिंचाई के लिए किया जाता हैं। इसी कारण फसलें उगती हैं और हर तरफ खेत में हरियाली छा जाती है। इन्हीं फसलों से अनाज की उत्पत्ति होती है। सारी सृष्टि के भोजन की व्यवस्था होती है। लोककल्याण करना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है। समय के साथ उन्नति हुई। अनेक परिवर्तन हुए। मेरे तटों पर घाट बनाए गए। नए-नए उद्योग-धंधे विकसित होने लगे। बाँध बाँधे गए।
प्रकृति के आगे कभी-कभी मैं विवश हो जाती हूँ क्योंकि कभी बहुत अधिक वर्षा के कारण, जब जलस्तर बढ़ता है।मेरे किनारों पर बसे गाँव, खेत, पशु-पक्षी बह जाते हैं। तब मुझे बहुत दु:ख होता है। मेरी जलधारा सदैव बहती रहती है। मानव मुझे उपयोग तो कर लेता है, परंतु मुझे दूषित करने की कोशिश भी करता है। प्लास्टिक, कचरा, कारखानों का दूषितपानी मनुष्यों द्वारा मुझमें फेंका जाता है, जो मेरे पानी को दूषित कर रहा है। इसी कारण मैं समस्त मानवजाति से अनुरोध करना चाहूँगी कि मेरे पानी को साफ रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँ। धन्यवाद !
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