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प्रश्न
निम्नलिखित वाक्य से अंत करते हुए एक कहानी लिखिए:
'.....और मैं चाह कर भी उस कारुणिक दृश्य को भुला नहीं पाया, पायी'।
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उत्तर
वह एक सर्दियों की शाम थी, जब मैं अपने गाँव के रास्ते से गुजर रहा था। गाँव के किनारे एक छोटा सा तालाब था, जहाँ बच्चे अक्सर खेलते थे और गाँव की महिलाएँ पानी भरने आती थीं। उस दिन तालाब के पास एक भीड़ जमा थी, और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वहाँ क्या हो रहा है। जिज्ञासा से भरा हुआ मैं भी उस भीड़ की ओर बढ़ा। जब मैं वहाँ पहुँचा, तो देखा कि तालाब के किनारे एक महिला बैठी हुई थी। उसके चेहरे पर चिंता और भय की लकीरें साफ दिख रही थीं। उसके पास ही एक बच्चा बेसुध पड़ा था। लोग उसे घेरकर खड़े थे और तरह-तरह की बातें कर रहे थे। कोई कह रहा था कि बच्चा तालाब में गिर गया था और किसी ने उसे बाहर निकाला, लेकिन अब वह बेहोश था।
मैंने जल्दी से आगे बढ़कर बच्चे की नब्ज़ देखी। वह धीरे-धीरे सांस ले रहा था, लेकिन उसकी हालत गंभीर लग रही थी। मैंने तुरंत गांव के डॉक्टर को बुलाने के लिए किसी को भेजा और तब तक बच्चे को सीपीआर देना शुरू किया। थोड़ी देर बाद डॉक्टर पहुँचा और उसने तुरंत बच्चे का इलाज शुरू किया। कई मिनटों की मेहनत के बाद बच्चा होश में आया और उसकी माँ ने राहत की सांस ली। वह महिला लगातार रो रही थी और भगवान का धन्यवाद कर रही थी। बच्चा अब ठीक था, लेकिन उस घटना ने मेरे दिल में गहरी छाप छोड़ दी। उस मासूम चेहरे को बेहोशी की हालत में देखकर मेरे दिल में एक अनजानी पीड़ा हुई।
मैं उस दिन की घटना को भुला नहीं पाया। उस बच्चे की माँ की आँखों में जो दर्द और डर था, वह आज भी मेरी आँखों के सामने घूमता है। उसकी आँखों से बहते आँसू और उसके चेहरे पर छायी चिंता मेरे दिल में घर कर गई। वह कारुणिक दृश्य मुझे बार-बार याद आता है और मुझे यह सोचने पर मजबूर करता है कि हमें अपने आस-पास के लोगों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए। उस दिन ने मुझे सिखाया कि जीवन अनमोल है और हमें हर संभव कोशिश करनी चाहिए कि किसी की मदद कर सकें। उस बच्चे की बेहोशी और उसकी माँ का दर्द भरा चेहरा मेरे दिल में एक गहरी छाप छोड़ गया, और मैं चाह कर भी उस कारुणिक दृश्य को भुला नहीं पाया।
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