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प्रश्न
।। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ ।।
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उत्तर
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ (BBBP) यह एक सरकारी योजना है जो २२ जनवरी, २०१५ को शुरू की गई। इस घोषवाक्य से ही योजना का आशय स्पष्ट हो जाता है। बेटी बचाना अर्थात केवल बेटों को महत्त्व न देकर बेटियों को भी जीने का अधिकार दिया जाए और साथ-ही-साथ बेटियों को पढ़ने का सुअवसर भी प्राप्त हो। यह योजना बनाने का मुख्य उद्देश्य तो बेटियों के अस्तित्व को बचाना है, किंतु इसके साथ कुछ अन्य उद्देश्य भी निम्नलिखित हैं:
- बालिकाओं को संरक्षण और सशक्त करना।
- जनसंख्या के आधार पर लिंगानुपात समान करने का प्रयास।
- पक्षपाती लिंग चुनाव की प्रक्रिया का उन्मूलन।
- बालिकाओं की शिक्षा सुनिश्चित करना।
- बालिकाओं को शिक्षा, नौकरी, व्यवसाय व अन्य क्षेत्रों में समानता का अधिकार दिलाना।
इस प्रकार से बालिका और शिक्षा दोनों को बढ़ावा देकर एक सामाजिक आंदोलन व परिवर्तन को आधार देना ही 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' योजना का कार्यक्षेत्र है। समानता के मूल्य को बढ़ावा देने व समाज में जागरूकता लाने का कार्य यह योजना कर रही है।
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एक से सौ तक की उलटी गिनती पढ़ो और काॅपी में लिखो :

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निम्नलिखित परिच्छेद पढ़कर इसपर आधारित ऐसे चार प्रश्न तैयार कीजिए. जिनके उत्तर एक-एक वाक्य में हों:
| “कोई काम छोटा नहीं। कोई काम गंदा नहीं। कोई भी काम नीचा नहीं। कोई काम असंभव भी नहीं कि व्यक्ति ठान ले और ईश्वर उसकी मदद न करे। शर्त यही है कि वह काम, काम का हो। किसी भी काम के लिए 'असंभव', 'गंदा' या 'नीचा' शब्द मेरे शब्दकोश में नहीं है।'' ऐसी वाणी बोलने वाली मदर टेरेसा को कोढ़ियों की सेवा करते देखकर एक बार एक अमेरिकी महिला ने कहा, “मैं यह कभी नहीं करती।'' मदर टेरेसा के उपरोक्त संक्षिप्त उत्तर से वह महिला शर्म से सिकुड़ गई थी। सचमुच ऐसे कार्य का मूल्य क्या धन से आँका जा सकता है या पैसे देकर किसी की लगन खरीदी जा सकती है ? यह काम तो वही कर सकता है, जो ईश्वरीय आदेश समझकर अपनी लगन इस ओर लगाए हो। जो गरीबों, वंचितों, जरूरतमंदों में ईश्वरीय उपासना का मार्ग देखता हो और दुखी मानवता में उसके दर्शन करता हो। ईसा, गांधी, टेरेसा जैसे परदुखकातर, निर्मल हृदयवाले लोग ही कोढ़ियों और मरणासन्न बीमारों की सेवा कर सकते हैं और 'निर्मल हृदय' जैसी संस्थाओं की स्थापना करते हैं। |
