English

'सूरदास उठ खड़ा हुआ और विजय-गर्व की तरंग में राख के ढेर को दोनों हाथों से उड़ाने लगा।' इस कथन के संदर्भ में सूरदास की मनोदशा का वर्णन कीजिए।

Advertisements
Advertisements

Question

'सूरदास उठ खड़ा हुआ और विजय-गर्व की तरंग में राख के ढेर को दोनों हाथों से उड़ाने लगा।' इस कथन के संदर्भ में सूरदास की मनोदशा का वर्णन कीजिए।
Answer in Brief
Advertisements

Solution

सूरदास अपने रुपए की चोरी की बात से दुखी हो चूका था। उसे लगा की उसके जीवन में अब कुछ शेष नहीं बचा है। उसके मन में परेशानी, दुख ग्लानि तथा नैराश्य के भाव उसे नहला रहे थे। अचानक घीसू द्वारा मिठुआ को यह कहते हुए सुना कि खेल में रोते हो। इन कथनों की सूरदास की मनोदशा पर चमत्कारी परिवर्तन कर दिया। दुखी और निराश सूरदास जैसे जी उठा। उसे अहसास हुआ कि जीवन संघर्षों का नाम है। इसमें हार-जीत लगी रहती है। इंसान को चोट तथा धक्कों से डरना नहीं चाहिए। बल्कि जीवन संघर्षों का डटकर सामना करना चाहिए। जो मनुष्य जीवन रूपी खेल में हार मान लेता है, उसे दुख और निराशा के अलावा कुछ नहीं मिलता है। घीसू के वचनों ने उसे समझाया कि खेल में बच्चे भी रोना अच्छा नहीं मानते, तो वह किसलिए रो रहा है। बस जैसे वह जाग उठा और राख के बीच रोता-बिलखता सूरदास उठ खड़ा हुआ। अपने दुख पर प्राप्त विजय-गर्व की तरंग ने जैसे उसमें प्राण डाल दिए और वह राख के ढेर को प्रसन्नता से दोनों हाथों से उड़ाने लगा। यह ऐसे मनुष्य की मनोदशा है, जिसने हार का मुँह तो देखा परन्तु जो हारा नहीं बल्कि अपनी हार को भी जीत में बदल दिया।
shaalaa.com
सूरदास की झोंपड़ी
  Is there an error in this question or solution?
Chapter 1: सूरदास की झोंपड़ी - प्रश्न-अभ्यास [Page 10]

APPEARS IN

NCERT Hindi Antaraal Bhag 2 [English] Class 12
Chapter 1 सूरदास की झोंपड़ी
प्रश्न-अभ्यास | Q 6. | Page 10

RELATED QUESTIONS

‘चूल्हा ठंडा किया होता, तो दुश्मनों का कलेजा कैसे ठंडा होता?’ नायकराम के इस कथन में निहित भाव को स्पष्ट कीजिए।


भैरों ने सूरदास की झोपड़ी क्यों जलाई?


'यह फूस की राख न थी, उसकी अभिलाषाओं की राख थी।' संदर्भ सहित विवेचन कीजिए।


जगधर के मन में किस तरह का ईर्ष्या-भाव जगा और क्यों?


सूरदास जगधर से अपनी आर्थिक हानि को गुप्त क्यों रखना चाहता था?


'तो हम सौ लाख बार बनाएँगे।' इस कथन के संदर्भ में सूरदास के चरित्र का विवेचन कीजिए।


इस पाठ का नाट्य रूपांतर कर उसकी प्रस्तुति कीजिए।


प्रेमचंद के उपन्यास 'रंगभूमि' का संक्षिप्त संस्करण पढ़िए।


अभिलाषाओं की राख से तात्पर्य है -


सूरदास कहाँ तो नैराश्य, ग्लानि, चिंता और क्षोभ के अपार जल में गोते खा रहा था, कहाँ यह चेतावनी सुनते ही उसे ऐसा मालूम हुआ किसी ने उसका हाथ पकड़कर किनारे पर खड़ा कर दिया।

नकारात्मक मानवीय पहलुओं पर अकेले सूरदास का व्यक्तित्व भारी पड़ गया। जीवन मूल्यों की दृष्टि से इस कथन पर विचार कीजिए।


'तो हम सौ लाख बार बनाएंगे' इस कथन के संदर्भ में सूरदास के चरित्र की विशेषता है -


'अभिलाषाओं की राख है' से क्या अभिप्राय है?


कथन (A) - जीवन के मर्म का ज्ञान ही दुखों से मुक्ति है।

कारण (R) - सूरदास विजय गर्व की तरंग में राख के ढेर को दोनों हाथों से उड़ाने लगा।


निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर लगभग 60 शब्दों में लिखिए -

"सच्चे खिलाड़ी कभी रोते नहीं, बाजी पर बाजी हारते हैं, चोट पर चोट खाते हैं, धक्के सहते हैं पर मैदान में डटे रहते हैं।" परीक्षा के समय को आधार मानकर 'सूरदास की झोंपड़ी' पाठ क्या संदेश देता है?


Share
Notifications

Englishहिंदीमराठी


      Forgot password?
Use app×