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इस पाठ का नाट्य रूपांतर कर उसकी प्रस्तुति कीजिए।

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इस पाठ का नाट्य रूपांतर कर उसकी प्रस्तुति कीजिए।

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शीर्षक: सूरदास की झोंपड़ी

पात्र: सूत्रधार, सूरदास, बजरंगी, जगधर, नायकराम, भैरों, सुभागी और मिठुआ

दृश्य 1: जलती हुई झोंपड़ी

(मंच पर अँधेरा है। आग की लाल रोशनी और लोगों के शोर से वातावरण बनता है। सूरदास लाठी टेकता हुआ आता है।)

सूत्रधार: रात के दो बजे सूरदास की झोंपड़ी में आग लग गई। देखते ही देखते लोग वहाँ जमा हो गए। सब आग बुझाने की कोशिश करने ल��े।

बजरंगी: सूरे, यह आग कैसे लगी? चूल्हे में आग तो नहीं छोड़ दी थी?

सूरदास: क्या मैं झोंपड़ी के अंदर जा सकता हूँ?

बजरंगी: अब वहाँ जाना बहुत खतरनाक है। लपटें देखो!

जगधर: सूरे, आज चूल्हा ठंडा नहीं किया था क्या?

नायकराम: जिसने आग लगाई है, उसका कलेजा भी ठंडा नहीं रहेगा!

(आग धीरे-धीरे बुझती है। लोग चले जाते हैं। सूरदास राख के पास अकेला बैठा रहता है।)

दृश्य 2: राख में खोई पोटली

सूत्रधार: सूरदास को झोंपड़ी जलने से अधिक अपनी मेहनत की कमाई की चिंता थी। उसकी पोटली में पाँच सौ से अधिक रुपये थे। वह राख में उसे ढूँढ़ने लगा।

(सूरदास लाठी से राख टटोलता है। कुछ बरतन मिलते हैं, पर पोटली नहीं। वह बैठकर रोने लगता है।)

सूरदास: मेरी सारी आशाएँ इसी पोटली में थीं। अब मिठुआ का ब्याह कैसे होगा? पितरों का पिंडदान कैसे करूँगा?

(जगधर प्रवेश करता है।)

जगधर: सूरे, तुम्हें मुझ पर तो शक नहीं है?

सूरदास: तुम्हारी तरफ़ से मेरा दिल साफ है। कौन जाने, आग कैसे लगी।

दृश्य 3: भैरों का सच

(मंच के दूसरे हिस्से में भैरों बैठा है। उसके हाथ में काली पड़ी थैली है। जगधर उसके पास आता है।)

भैरों: यह देखो! सूरदास की झोंपड़ी से मिली रुपयों की थैली। अब उसका घमंड उतर जाएगा।

जगधर: ये रुपये उसे लौटा दो। उसने बड़ी मेहनत से जोड़े होंगे।

भैरों: मैं नहीं लौटाऊँगा। जब तक उसे रोता हुआ नहीं देखूँगा, मेरा मन शांत नहीं होगा।

(सुभागी आती है। जगधर उसे बताता है कि भैरों के पास सूरदास की थैली है।)

सुभागी: मेरे कारण सूरदास पर यह विपत्ति आई है। मैं उसके रुपये वापस दिलाऊँगी।

सूरदास: नहीं, मेरे पास कोई रुपये नहीं थे।

सुभागी: तुम चाहे छिपाओ, तुम्हारा चेहरा बता रहा है कि रुपये तुम्हारे ही थे।

दृश्य 4: नया संकल्प

(सूरदास अकेला बैठा रो रहा है। मिठुआ कहीं से आता है।)

मिठुआ: दादा, तुम खेल में रोते हो!

सूत्रधार: मिठुआ की बातें सुनकर सूरदास को लगा कि जीवन की कठिनाइयों से हारकर रोना ठीक नहीं। सच्चा खिलाड़ी चोट खाकर भी मैदान में डटा रहता है।

(सूरदास उठता है और राख को हटाने लगता है। बच्चे भी उसकी मदद करते हैं।)

मिठुआ: दादा, अब हम कहाँ रहेंगे?

सूरदास: दूसरा घर बनाएँगे।

मिठुआ: कोई फिर आग लगा दे तो?

सूरदास: तो फिर बनाएँगे।

मिठुआ: और कोई सौ लाख बार आग लगा दे?

सूरदास: तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे!

सूत्रधार: सूरदास ने हार मानने के बजाय फिर से जीवन बनाने का संकल्प लिया।

(सभी पात्र मंच पर आते हैं। पर्दा गिरता है।)

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सूरदास की झोंपड़ी
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Chapter 1: सूरदास की झोंपड़ी - योग्यता-विस्तार [Page 11]

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NCERT Hindi Antaraal Bhag 2 Class 12
Chapter 1 सूरदास की झोंपड़ी
योग्यता-विस्तार | Q 1. | Page 11

RELATED QUESTIONS

‘चूल्हा ठंडा किया होता, तो दुश्मनों का कलेजा कैसे ठंडा होता?’ नायकराम के इस कथन में निहित भाव को स्पष्ट कीजिए।


भैरों ने सूरदास की झोपड़ी क्यों जलाई?


'यह फूस की राख न थी, उसकी अभिलाषाओं की राख थी।' संदर्भ सहित विवेचन कीजिए।


जगधर के मन में किस तरह का ईर्ष्या-भाव जगा और क्यों?


सूरदास जगधर से अपनी आर्थिक हानि को गुप्त क्यों रखना चाहता था?


'सूरदास उठ खड़ा हुआ और विजय-गर्व की तरंग में राख के ढेर को दोनों हाथों से उड़ाने लगा।' इस कथन के संदर्भ में सूरदास की मनोदशा का वर्णन कीजिए।

'तो हम सौ लाख बार बनाएँगे।' इस कथन के संदर्भ में सूरदास के चरित्र का विवेचन कीजिए।


प्रेमचंद के उपन्यास 'रंगभूमि' का संक्षिप्त संस्करण पढ़िए।


अभिलाषाओं की राख से तात्पर्य है -


सूरदास कहाँ तो नैराश्य, ग्लानि, चिंता और क्षोभ के अपार जल में गोते खा रहा था, कहाँ यह चेतावनी सुनते ही उसे ऐसा मालूम हुआ किसी ने उसका हाथ पकड़कर किनारे पर खड़ा कर दिया।

नकारात्मक मानवीय पहलुओं पर अकेले सूरदास का व्यक्तित्व भारी पड़ गया। जीवन मूल्यों की दृष्टि से इस कथन पर विचार कीजिए।


'तो हम सौ लाख बार बनाएंगे' इस कथन के संदर्भ में सूरदास के चरित्र की विशेषता है -


'अभिलाषाओं की राख है' से क्या अभिप्राय है?


कथन (A) - जीवन के मर्म का ज्ञान ही दुखों से मुक्ति है।

कारण (R) - सूरदास विजय गर्व की तरंग में राख के ढेर को दोनों हाथों से उड़ाने लगा।


निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर लगभग 60 शब्दों में लिखिए -

"सच्चे खिलाड़ी कभी रोते नहीं, बाजी पर बाजी हारते हैं, चोट पर चोट खाते हैं, धक्के सहते हैं पर मैदान में डटे रहते हैं।" परीक्षा के समय को आधार मानकर 'सूरदास की झोंपड़ी' पाठ क्या संदेश देता है?


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