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Question
निम्नलिखित पठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:
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शामनाथ की पार्टी सफलता के शिखर चूमने लगी। कहीं कोई रुकावट न थी, कोई अड़चन न थी। मेम साहब को परदे पसंद आए थे, सोफा कवर का डिजाइन पसंद आया था, कमरे की सजावट पसंद आई थी। इससे बढ़कर क्या चाहिए। साहब तो चुटकुले और कहानियाँ कहने लग गए थे। दफ्तर में जितना रोब रखते थे, यहाँ पर उतने ही दोस्तपरवर हो रहे थे और उनकी स्त्री, काला गाउन पहने, गले में सफेद मोतियों का हार, सेंट और पावडर की महक से ओत-प्रोत, कमरे में बैठी सभी देशी स्त्रियों की आराधना का केंद्र बनी हुई थीं। बात-बात पर हँसतीं, बात-बात पर सिर हिलातीं और शामनाथ की स्त्री से तो ऐसे बातें कर रही थीं, जैसे उनकी पुरानी सहेली हो। इसी रौ में साढ़े दस बज गए। वक्त कब गुजर गया पता ही न चला। बरामदे में पहुँचते ही शामनाथ सहसा ठिठक गए। जो दृश्य उन्होंने देखा, उससे उनकी टाँगें लड़खड़ा गईं, बरामदे में ऐन कोठरी के बाहर माँ अपनी कुर्सी पर ज्यों-की-त्यों बैठी थीं। मगर दोनों पाँव कुर्सी की सीट पर रखे हुए और सिर दाएँ से बाएँ और बाएँ से दाएँ झूल रहा था। |
- एक/दो शब्दों में उत्तर लिखिए: [2]
- सफलता का शिखर चूमने वाली − -------------
- सभी देशी स्त्रियों की आराधना का केंद्र बनने वाली − -------------
- चुटकुले और कहानियाँ कहने वाले − -------------
- शामनाथ के पीछे-पीछे चलने वाले − -------------
- कारण लिखिए: [2]
- शामनाथ बरामदे में आते ही ठिठक गए -------------
- सब लोग बैठक से उठकर बाहर निकले -------------
- ‘बड़े-बुजुर्ग दया नहीं, सम्मान के पात्र होते हैं’ इस विषय पर 30 से 40 शब्दों में अपने विचार लिखिए। [3]
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Solution
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- शामनाथ की पार्टी।
- मेम साहब।
- चीफ साहब।
- चीफ और दूसरे मेहमान।
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- शामनाथ बरामदे में आते ही ठिठक गए क्योंकि, उनकी माँ कोठरी से निकलकर बरामदे में कुर्सी पर ज्यों -की-त्यों बैठी थीं तथा उनके दोनों पाँव कुर्सी की सीट पर थे और सिर दाएँ से बाएँ झूल रहा था।
- सब लोग खाना खाने के लिए बैठक से उठकर बाहर निकले।
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परिवर्तन प्रकृति का स्थायी नियम है और मनुष्य भी इसके दायरे में आता है। जीवन की शुरुआत से अंत तक वह निरंतर बदलावों से गुजरता है। यह सम्पूर्ण जीवन यात्रा बचपन की अपरिपक्वता से वयस्कता की परिपक्वता की ओर होती है। बुढ़ापे में शरीर कमजोर हो जाता है और व्यक्ति शारीरिक रूप से असहाय हो जाता है। उसे दैनिक कार्यों के लिए भी दूसरों की मदद की ज़रूरत होती है। जीवन भर सब कुछ देने के बाद वह पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाता है। ऐसी स्थिति में वृद्धों को दया नहीं, बल्कि प्रेम और सम्मान की आवश्यकता होती है। वे असहाय नहीं, बल्कि त्याग और अनुभव के प्रतीक होते हैं। इसलिए उनके साथ स्नेहपूर्ण और सम्मानजनक व्यवहार किया जाना चाहिए, न कि दया का।
