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राष्ट्रभाषा से अभिप्राय है - राष्ट्र की भाषा। यह देश के सभी प्रांतों के बीच होने वाले व्यापार और सार्वजनिक व्यवहार में सभी देशवासियों द्वारा व्यवहार में लाई जाती है। उत्तर में बद्रीनाथ - Hindi [हिंदी]

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Question

निम्नलिखित अपठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:

राष्ट्रभाषा से अभिप्राय है - राष्ट्र की भाषा। यह देश के सभी प्रांतों के बीच होने वाले व्यापार और सार्वजनिक व्यवहार में सभी देशवासियों द्वारा व्यवहार में लाई जाती है। उत्तर में बद्रीनाथ-केदारनाथ से दक्षिण में रामेश्वरम् तक तथा अमृतसर से कटक तक सभी जगहों पर संपर्क भाषा के रूप में इसका प्रयोग होता है। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है। हम सभी हिंदी भाषा बोलने वालों का यह कर्तव्य है कि हिंदी भाषा में राष्ट्रभाषा होने की अधिक-से-अधिक योग्यता पैदा करें। आज के युग में जहाँ विज्ञान की खोजों से स्थान और समय की दूरी समाप्त होती जा रही है। कोई भी भाषा दूसरी भाषा के संपर्क से स्वयं को अछूता नहीं रख सकती।

हिंदी ने उर्दू, फ़ारसी, अरबी, अंग्रेजी सभी को अपनाया है। इसमें किसी दूसरी भाषा के बहिष्कार की प्रवृत्ति नहीं है।

  1. लिखिए:      [2]
    हिंदी भाषा की दो विशेषताएँ:
    1. ------------------
    2. ------------------
  2. कृति पूर्ण कीजिए:      [2]
    गद्यांश में उल्लिखित भाषाएँ -
    (i) ------------------
    (ii) ------------------
    (iii) ------------------
    (iv) ------------------

  3. ‘भाषा बिन होते मूक सारे व्यवहार’ इस विषय पर 25 से 30 शब्दों में अपने विचार लिखिए।      [2]
Comprehension
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Solution

    1. व्यापार और सार्वजनिक व्यवहार में उपयोग की जाने वाली भाषा।
    2. संपूर्ण देश की संपर्क भाषा।
  1. गद्यांश में उल्लिखित भाषाएँ -
    (i) उर्दू
    (ii) फ़ारसी
    (iii) अरबी
    (iv) अंग्रेजी
  2. भाषा मानव जीवन के लिए एक अनिवार्य साधन है। इसके बिना जीवन अधूरा और नीरस प्रतीत होता है। भाषा के माध्यम से हम अपने विचार, भावनाएँ और ज्ञान दूसरों तक पहुँचाते हैं। यह हमारी आवश्यकताओं को व्यक्त करने और दूसरों की आवश्यकताओं को समझने का जरिया भी है।
    चाहे शिक्षा हो या विज्ञान, कला हो या साहित्य, या फिर धर्म का क्षेत्र हर जगह भाषा ही वह माध्यम है जिसके द्वारा हम ज्ञान प्राप्त करते हैं और अपने विचार साझा करते हैं। भाषा के बिना किसी भी प्रकार की अभिव्यक्ति की कल्पना संभव नहीं है।
    जिस प्रकार कोई गूंगा व्यक्ति गुड़ की मिठास को महसूस तो करता है लेकिन उसे कह नहीं सकता, उसी प्रकार भाषा के अभाव में मनुष्य भी अपने भावों को व्यक्त नहीं कर पाता। वास्तव में मानव विकास की नींव भी भाषा पर ही टिकी हुई है।
    इसलिए यह कहना उचित ही है कि – “भाषा के बिना सभी व्यवहार मौन हो जाते हैं।”
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