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Question
रामचरितमानस के इस प्रसंग का मंचन लोकनाट्य, रामलीला और कठपुतली कला में बड़ी जीवंतता से किया जा सकता है। कलात्मक तकनीकों (ध्वनि, भाव, संगीत, वेशभूषा) का उपयोग करते हुए कविता को एक दृश्य नाटक के रूप में प्रस्तुत कीजिए।
Activity
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Solution
इस प्रसंग (राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद) को मंच पर प्रभावशाली नाटक के रूप में निम्न प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है-
1. मंच व्यवस्था (सेट डिज़ाइन)
- मंच को राजा जनक की राजसभा के रूप में सजाया जाए।
- मंच के मध्य में टूटा हुआ शिव-धनुष रखा हो।
- दोनों तरफ विभिन्न राजाओं के बैठने की व्यवस्था हो।
- पृष्ठभूमि में मंदिर जैसा दृश्य तथा हल्की धुंधली रोशनी रखी जाए, जिससे तनावपूर्ण वातावरण बने।
2. आरंभिक दृश्य (ध्वनि और वातावरण)
- अचानक तेज़ ढोल-नगाड़ों की गूँज सुनाई दे।
- भय और तनाव का माहौल बनाने के लिए हवा की आवाज़ का प्रयोग किया जाए।
- सभा में उपस्थित सभी पात्रों के चेहरे पर चिंता और भय के भाव दिखाई दें।
3. परशुराम का प्रवेश (वेशभूषा और ध्वनि प्रभाव)
- परशुराम का प्रवेश तेज़ चाल और प्रभावशाली ध्वनि के साथ कराया जाए।
- उनकी वेशभूषा में गेरुए वस्त्र, हाथ में परशु और चेहरे पर क्रोध के भाव हों।
- पृष्ठभूमि में गंभीर ढोल की गूँज सुनाई दे।
संवाद शैली
परशुराम के संवाद कठोर, ऊँचे और प्रभावशाली स्वर में बोले जाएँ, जैसे-
“रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार...”
shaalaa.com
Notes
विद्यार्थी इस गतिविधि को अपनी कल्पनाशक्ति और रचनात्मकता का प्रयोग करते हुए स्वयं करें।
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