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कहानी के किस-किस मोड़ पर लुट्टन के जीवन में क्या-क्या परिवर्तन आए?
Chapter: [1.14] फणीश्वर नाथ रेणु : पहलवान की ढोलक
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लुट्टन पहलवान ने ऐसा क्यों कहा होगा कि मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोल है?
Chapter: [1.14] फणीश्वर नाथ रेणु : पहलवान की ढोलक
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गाँव में महामारी फैलने और अपने बेटों के देहांत के बावजूद लुट्टन पहलवान का ढोल क्यों बजाता रहा?
Chapter: [1.14] फणीश्वर नाथ रेणु : पहलवान की ढोलक
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ढोलक की आवाज़ का पूरे गाँव पर क्या असर होता था?
Chapter: [1.14] फणीश्वर नाथ रेणु : पहलवान की ढोलक
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महामारी फैलने के बाद गाँव में सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य में क्या अंतर होता था?
Chapter: [1.14] फणीश्वर नाथ रेणु : पहलवान की ढोलक
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कुश्ती या दंगल पहले लोगों और राजाओं का प्रिय शौक हुआ करता था। पहलवानों को राजा लोगों के द्वारा विशेष सम्मान दिया जाता था-
- ऐसी स्थिति अब क्यों नहीं है?
- इसकी जगह अब किन खेलों ने ले ली है?
- कुश्ती को फिर से प्रिय खेल बनाने के लिए क्या-क्या कार्य किए जा सकते हैं?
Chapter: [1.14] फणीश्वर नाथ रेणु : पहलवान की ढोलक
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आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी। अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे।
Chapter: [1.14] फणीश्वर नाथ रेणु : पहलवान की ढोलक
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पाठ में अनेक स्थलों पर प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। पाठ में से ऐसे अंश चुनिए और उनका आशय स्पष्ट कीजिए।
Chapter: [1.14] फणीश्वर नाथ रेणु : पहलवान की ढोलक
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पाठ में मलेरिया और हैज़े से पीड़ित गाँव की दयनीय स्थिति को चित्रित किया गया है। आप किसी ऐसी अन्य आपद स्थिति की कल्पना करें और लिखे कि आप ऐसी स्थिति का सामना कैसे करेंगी/करेंगे?
Chapter: [1.14] फणीश्वर नाथ रेणु : पहलवान की ढोलक
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ढोलक की थाप मृत-गाँव में संजीवनी शक्ति भरती रहती थी- कला से जीवन के संबंध को ध्यान में रखते हुए चर्चा कीजिए।
Chapter: [1.14] फणीश्वर नाथ रेणु : पहलवान की ढोलक
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चर्चा करें- कलाओं का अस्तित्व व्यवस्था का मोहताज़ नहीं है।
Chapter: [1.14] फणीश्वर नाथ रेणु : पहलवान की ढोलक
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हर विषय, क्षेत्र, परिवेश आदि के कुछ विशिष्ट शब्द होते हैं। पाठ में कुश्ती से जुड़ी शब्दावली का बहुतायत प्रयोग हुआ है। उन शब्दों की सूची बनाइए। साथ ही नीचे दिए गए क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाले कोई पाँच-पाँच शब्द बताइए-
- चिकित्सा
- क्रिकेट
- न्यायालय
- या अपनी पसंद का कोई क्षेत्र
Chapter: [1.14] फणीश्वर नाथ रेणु : पहलवान की ढोलक
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पाठ में अनेक अंश ऐसे हैं जो भाषा के विशिष्ट प्रयोगों की बानगी प्रस्तुत करते हैं। भाषा का विशिष्ट प्रयोग न केवल भाषाई सर्जनात्मकता को बढ़ावा देता है बल्कि कथ्य को भी प्रभावी बनाता है। यदि उन शब्दों, वाक्यांशों के स्थान पर किन्हीं अन्य का प्रयोग किया जा तो संभवतः वह अर्थगत चमत्कार और भाषिक सौंदर्य उद्घाटित न हो सके। कुछ प्रयोग इस प्रकार हैं-
- फिर बाज़ की तरह उस पर टूट पड़ा।
- राजा साहब की स्नेह-दृष्टि ने उसकी प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए।
- पहलवान की स्त्री भी दो पहलवानों को पैदा करके स्वर्ग सिधार गई थी।
इन विशिष्ट भाषा-प्रयोगों का प्रयोग करते हुए एक अनुच्छेद लिखिए।
Chapter: [1.14] फणीश्वर नाथ रेणु : पहलवान की ढोलक
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जैसे क्रिकेट की कमेंट्री की जाती है वैसे ही कुश्ती की कमेंट्री की गई है? आपको दोनों में क्या समानता और अंतर दिखाई पड़ता है?
Chapter: [1.14] फणीश्वर नाथ रेणु : पहलवान की ढोलक
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लेखक ने ऐसा क्यों कहा है कि अभी चैप्लिन पर करीब 50 वर्षों तक काफी कुछ कहा जाएगा?
Chapter: [1.15] विष्णु खरे : चार्ली चैप्लिन यानी हम सब
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चैप्लिन ने न सिर्फ़ फ़िल्म-कला को लोकतांत्रिक बनाया बल्कि दर्शकों की वर्ग तथा वर्ण-व्यवस्था को तोड़ा। इस पंक्ति में लोकतांत्रिक बनाने का और वर्ण-व्यवस्था तोड़ने का क्या अभिप्राय है? क्या आप इससे सहमत हैं?
Chapter: [1.15] विष्णु खरे : चार्ली चैप्लिन यानी हम सब
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लेखक ने चार्ली का भारतीयकरण किसे कहा और क्यों? गांधी और नेहरू ने भी उनका सान्निध्य क्यों चाहा?
Chapter: [1.15] विष्णु खरे : चार्ली चैप्लिन यानी हम सब
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लेखक ने कलाकृति और रस के संदर्भ में किसे श्रेयस्कर माना है और क्यों? क्या आप कुछ ऐसे उदाहरण दे सकते हैं जहाँ कई रस साथ-साथ आए हों?
Chapter: [1.15] विष्णु खरे : चार्ली चैप्लिन यानी हम सब
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जीवन की जद्दोजहद न चार्ली के व्यक्तित्व को कैसे संपन्न बनाया?
Chapter: [1.15] विष्णु खरे : चार्ली चैप्लिन यानी हम सब
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चार्ली चैप्लिन की फिल्मों में निहित त्रासदी/करुणा/हास्य का सामंजस्य भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र की परिधि में क्यों नहीं आता?
Chapter: [1.15] विष्णु खरे : चार्ली चैप्लिन यानी हम सब
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