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Question
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वह तो जब डॉक्टर साहब की ज़मानत ज़ब्त हो गई तब घर में ज़रा सन्नाटा हुआ और टोपी ने देखा कि इम्तहान सिर पर खड़ा है। वह पढ़ाई में जुट गया। परंतु ऐसे वातावरण में क्या कोई पढ़ सकता था? इसलिए उसका पास ही हो जाना बहुत था। "वाह!" दादी बोलीं, "भगवान नज़रे-बद से बचाए। रफ़्तार अच्छी है। तीसरे बरस तीसरे दर्जे में पास तो हो गए।…." |
टोपी ज़हीन होने के बावजूद कक्षा में दो बार फेल हो गया। जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियों से हार मान लेना कहाँ तक उचित है? टोपी जैसे बच्चों के विषय में आपकी क्या राय है?
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Solution
ज़हीन (बुद्धिमान) होने के बावजूद भी टोपी नौवीं कक्षा में दो बार फेल हो गया। उसकी पारिवारिक परिस्थितियाँ उसकी पढ़ाई में बाधा उत्पन्न करती थीं। जब भी वह पढ़ने बैठता तो बड़े भाई या माँ को कोई काम याद आ जाता, जो सिर्फ़ वही कर सकता था। छोटा भाई उसकी कॉपियाँ खराब कर दिया करता था। दूसरे साल उसे टाइफाइड हो गया। डॉक्टर भृगु नारायण चुनाव के लिए खड़े हो गए और घर में चुनावी माहौल छा गया परंतु फिर उसने दृढ़निश्चय किया कि वह किसी भी तरह परीक्षा पास ज़रूर करेगा और उसने कर दि खाया। सच्ची लगन और दृढ़निश्चय से जो काम उसने तीसरे साल में किया उसे पहले साल में भी किया जा सकता था। परिस्थितियाँ सदैव हमारे अनुकूल नहीं होती परंतु उनका सामना करके कर्तव्यपथ पर बढ़कर ही हम लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं।
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