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“संवाद चाहे कितने भी तत्सम और क्लिष्ट भाषा में क्यों न लिखे गए हों। स्थिति और परिवेश की माँग के अनुसार यदि वे स्वाभाविक जान पड़ते हैं

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Question

“संवाद चाहे कितने भी तत्सम और क्लिष्ट भाषा में क्यों न लिखे गए हों। स्थिति और परिवेश की माँग के अनुसार यदि वे स्वाभाविक जान पड़ते हैं तो उनके दर्शक तक संप्रेषित होने में कोई मुश्किल नहीं है” क्या आप इससे सहमत हैं? पक्ष या विपक्ष में तर्क दें।

Very Long Answer
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Solution

हम इस कथन से सहमत हैं कि संवादों में तत्सम या कठिन शब्दों का प्रयोग होने पर भी, यदि वे स्थिति और परिवेश के अनुसार स्वाभाविक लगते हैं, तो दर्शकों तक उनका अर्थ आसानी से पहुँच जाता है।

इसका मुख्य कारण यह है कि नाटक देखते समय दर्शक स्वयं को उसके समय, स्थान और वातावरण से जोड़ लेता है। ऐतिहासिक या पौराणिक नाटकों में संस्कृतनिष्ठ भाषा भी अभिनय, हाव-भाव, आवाज़ के उतार-चढ़ाव और संवाद बोलने के तरीके के कारण समझ में आ जाती है। उदाहरण के लिए, रामायण और महाभारत पर आधारित नाटकों में ‘पिताश्री’, ‘भ्राताश्री’ और ‘माताश्री’ जैसे शब्द दर्शकों के लिए सहज और परिचित हैं।

इसी प्रकार जयशंकर प्रसाद, मोहन राकेश, धर्मवीर भारती और सुरेंद्र वर्मा जैसे नाटककारों के नाटकों में प्रयुक्त कठिन शब्दावली भी उनके परिवेश के कारण स्वाभाविक लगती है। इसलिए संवादों की भाषा से अधिक महत्वपूर्ण उनका प्रसंग, पात्र और प्रस्तुति होती है।

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Chapter 7: नाटक लिखने का व्याकरण - पाठ से संवाद [Page 119]

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NCERT Hindi Abhivyakti aur Madhyam Class 11 and 12
Chapter 7 नाटक लिखने का व्याकरण
पाठ से संवाद | Q 2. | Page 119
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