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Question
नीचे लिखी चौपाई को पढ़िए-
“नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।”
इस चौपाई को हम गद्य-रूप में भी लिख सकते हैं। इसमें राम परशुराम से विनम्रतापूर्वक कहते हैं- हे नाथ! शिव-धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा। आपकी क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? राम की यह बात सुनकर क्रोधित परशुराम कहते हैं।
अब आप नीचे दी गई चौपाई को गद्य-रूप में लिखिए-
“अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं । कुटिल भूप हरषे मन माहीं।।
सुर मुनि नाग नगर नर नारी सोचहिं सकल त्रास उर भारी।।”
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Solution
यहाँ दिए गए गद्य-रूप का पैराफ्रेज़ प्रस्तुत है:
राजा जनक भय के कारण कोई उत्तर नहीं दे पा रहे थे। उनकी इस स्थिति को देखकर कुछ स्वार्थी और कुटिल प्रवृत्ति के राजा भीतर ही भीतर प्रसन्न हो रहे थे। वहीं देवता, मुनि, नाग, नगरवासी तथा स्त्री-पुरुष सभी अत्यंत चिंतित थे और उनके मन में गहरा भय तथा घबराहट व्याप्त थी।
