Advertisements
Advertisements
Question
"मैंने निज दुर्बल ..... होड़ लगाई" इन पंक्तियों में 'दुर्बल पद बल' और 'हारी होड़' में निहित व्यंजना स्पष्ट कीजिए।
Advertisements
Solution
'दुर्बल पद बल' देवसेना के बल की सीमा का ज्ञान कराता है। अर्थात देवसेना अपने बल की सीमा को बहुत भली प्रकार से जानती है। उसे पता है कि वह बहुत दुर्बल है। इसके बाद भी वह अपने भाग्य से लड़ रही है।
'होड़ लगाई' पंक्ति में निहित व्यंजना देवसेना की लगन को दर्शाता है। देवसेना भली प्रकार से जानती है कि प्रेम में उसे हार ही प्राप्त होगी परन्तु इसके बाद भी पूरी लगन के साथ प्रलय (हार) का सामना करती है। वह हार नहीं मानती।
RELATED QUESTIONS
"मैंने भ्रमवश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई"‐ पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
कवि ने आशा को बावली क्यों कहा है?
काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए-
श्रमित स्वप्न की मधुमाया ........... तान उठाई।
काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए -
लौटा लो ...... लाज गँवाई।
देवसेना की हार या निराशा के क्या कारण हैं?
