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‘मैं प्रकृति बोल रही हूँ’ विषय पर निबंध लेखन कीजिए। - Hindi [हिंदी]

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Question

‘मैं प्रकृति बोल रही हूँ’ विषय पर निबंध लेखन कीजिए। 

Answer in Brief
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Solution

मैं प्रकृति बोल रही हूँ

सुनो, धरती वालों! मैं प्रकृति बोल रही हूँ। वह प्रकृति जिसमें तुम पले-बड़े हो। मैं तुमको पुकार रही हूँ। तुम मेरी पुकार ध्यान से सुनो। पहले मैं कितनी हरी-भरी थी। मेरे वृक्ष, मेरे पर्वत, मेरी नदी, मेरे समुद्र सब कुछ स्वच्छ थे। मेरी हवा साफ थी, मेरी मिट्टी साफ थी। अब तुमने उन सबको गंदा कर दिया। मुझे दूषित कर दिया।

मनुष्य घर बनाने के लिए वृक्षों की कटाई करते हैं। विकास के नाम पर जंगल काटे जा रहे हैं। जल संचयन की व्यवस्था नहीं हो रही है, उलटे धरती के नीचे का जल निकल उसे खोखला किया जा रहा है। मनुष्य केवल ले रहा है, दे कुछ भी नहीं रहा है। धरती के नीचे से कोयला, खनिज तेल, अभ्रक आदि चीजें निकाली जा रहीं हैं। मनुष्य पहाड़ों को तोड़ रहा है, इस कारण हमारा संतुलन बिगड़ रहा है।

विज्ञान के इस युग में मनुष्य तरह-तरह के कारखाने तैयार कर रहा है, उनसे पैदा होनेवाला धुआँ आसमान में जा रहा है, परिणामस्वरूप आसमान प्रदूषित हो रहा है। कारखानों से निकलने वाले जल को समुद्र अथवा नदियों में छोड़कर वह जल को प्रदूषित कर रहा हैं।

हे मानव! तुम अपनी महत्वाकांक्षाओं में पढ़कर मेरा नाश करने में लगे हो। तुमने मेरे संसाधनों का भरपूर दोहन किया है। बिल्कुल निर्दयी बनकर। अब मैं खोखली होती जा रही हूँ। मेरे अंदर कुछ नहीं बचा है। अब तो मुझ पर दया करो। जाग जाओ नहीं तो तुमने जो मेरा नाश आज कर दिया है तो एक दिन मेरा कहर तुम पर टूट पड़ेगा। फिर तुम्हारा अस्तित्व ही नहीं बचेगा।

मैं तुमसे कहना चाहती हूँ कि अब मैं तुम्हारी गलत आदतों का बोझ उठाने में असमर्थ हूँ। इसलिए अब मुझे बख्श दो मेरे पास जो थोड़ी बहुत संसाधन बचे हैं। तुम उनकी रक्षा करो। तभी मेरा अस्तित्व सुरक्षित रहेगा। मैं सही-सलामत रहूँगी, स्वच्छ रहूँगी तो तुम्हारा अस्तित्व सुरक्षित रहेगा।

मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि वह मेरा दोहन बंद करे ताकि वह सुख-शांति से रह सके।

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निबंध लेखन
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Chapter 1.09: ब्रजवासी - उपयोजित लेखन [Page 44]

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Balbharati Hindi Kumarbharati [Hindi] Standard 10 Maharashtra State Board
Chapter 1.09 ब्रजवासी
उपयोजित लेखन | Q १. | Page 44

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