English
Maharashtra State BoardSSC (English Medium) 10th Standard

माध्यमभाषया उत्तरं लिखत। रोहसेनः किमर्थं रोदिति?

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Question

माध्यमभाषया उत्तरं लिखत।

रोहसेनः किमर्थं रोदिति?

Long Answer
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Solution 1

English:

Rohasena was playing with his neighbor’s son’s golden cart. The neighbor’s then took the cart away. Rohasena began to cry because she had insisted on riding in the cart. Radanika tried to console him by giving him an earthen cart, but he argued, ‘What good is an earthen cart to me? I only want a golden cart.’ Charudatta’s father had become a pauper, making it impossible to meet his demand. As a result, when Vasantasena saw him for the first time, Rohasena burst into tears.

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Solution 2

मराठी:

रोहसेना शेजारच्या मुलाच्या सोन्याच्या गाड्याशी खेळत होता. त्यानंतर शेजाऱ्याने ती गाडी काढून घेतली. रोहसेना रडायला लागली कारण तिने गाडीत बसण्याचा हट्ट धरला होता. रदांतकाने त्याला मातीची गाडी देऊन सांत्वन करण्याचा प्रयत्न केला, पण त्याने युक्तिवाद केला, ‘माझ्यासाठी मातीची गाडी काय आहे? मला फक्त सोन्याची गाडी हवी आहे.’ चारुदत्तचे वडील गरीब झाले होते, त्यामुळे त्यांची मागणी पूर्ण करणे अशक्य होते. परिणामी, वसंतसेनाने जेव्हा त्याला पहिल्यांदा पाहिले तेव्हा रोहसेनाला अश्रू अनावर झाले.

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Solution 3

हिंदी:

रोहसेना पड़ोसी के लड़के की सोने की गाड़ी से खेल रहा था। तभी पड़ोसी ने गाड़ी छीन ली। रोहसेना रोने लगा क्योंकि वह गाड़ी में बैठने की ज़िद कर रहा था। रदंतक ने उसे मिट्टी की गाड़ी देकर शांत करने की कोशिश की, लेकिन उसने कहा, ‘मिट्टी की गाड़ी मेरे लिए क्या है? मुझे तो सोने की गाड़ी चाहिए।’ चारुदत्त के पिता गरीब हो गए थे, इसलिए उनकी मांग पूरी करना नामुमकिन था। इसलिए, जब वसंतसेना ने पहली बार रोहसेना को देखा तो वह फूट-फूट कर रोने लगा।

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संस्कृतनाट्यस्तबकः।
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Chapter 7: संस्कृतनाट्यस्तबक :। (संवाद:) - भाषाभ्यास: [Page 46]

APPEARS IN

Balbharati Sanskrit Amod [English] Standard 10 Maharashtra State Board
Chapter 7 संस्कृतनाट्यस्तबक :। (संवाद:)
भाषाभ्यास: | Q २) | Page 46

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माध्यमभाषया सरलार्थं लिखत।

वैखानस: (राजानम्‌ अवरुध्य) राजन्‌! आश्रममृगोऽयं, न हन्तव्य:, न हन्तव्य:। आशु प्रतिसंहर सायकम्‌।
राज्ञां शस्त्रम्‌ आर्तत्राणाय भवति न तु अनागसि प्रहर्तुम्‌।
दुष्यन्त प्रतिसंहत एष: सायक:। (यथोक्तं करोति)
वैखानस: राजन्‌! समिदाहरणाय प्रस्थिता वयम्‌। एष खलु कण्वस्य कुलपते: अनुमालिनीतीरमाश्रमो
दृश्यते। प्रविश्य प्रतिगृह्मताम्‌ आतिथेय: सत्कार:।

माध्यमभाषया सरलार्थं लिखत।

रदनिका एहि वत्स ! शकटिकया क्रीडावः।
दारकः (सकरुणम्‌) रदनिके ! किं मम एतया मृक्तिकाशकटिकया; तामेव सौवर्णशकटिकांदेहि।
रदनिका  (सनिर्वेदं निःश्वस्य) जात! कूतोऽस्माकं सुवर्णव्यवहारः ? तातस्य पुनरपि ऋद्धया सुवर्णशकटिकया करीडिष्यसि।

माध्यमभाषया उत्तरं लिखत।

दुष्यन्तस्य कानि स्वभाववैशिष्ट्यानि ज्ञायन्ते?


माध्यमभाषया उत्तरं लिखत।

शक्रस्य कपटं विशदीकुरुत।


माध्यमभाषया सरलार्थं लिखत।

(ततः प्रविशति वैखानसः, अन्यौ तापसौ च)
वैखानसः  (राजानम् अवरुध्य) राजन् ! आश्रममृगोऽयं, न हन्तव्यः, न हन्तव्यः। आशु प्रतिसंहर सायकम्। राज्ञां शस्त्रम् आर्तत्राणाय भवति न तु अनागसि प्रहर्तुम्।
दुष्यन्तः प्रतिसंहृत एष: सायक:। (यथोक्तं करोति)
वैखानसः  राजन्! समिदाहरणाय प्रस्थिता वयम्।

माध्यमभाषया सरलार्थं लिखत।

रदनिका एहि वत्स ! शकटिकया क्रीडाव:।
दारक: (सकरुणम्‌) रदनिके! किं मम एतया मृत्तिकाशकटिकया; तामेव सौवर्णशकटिकां देहि।
रदनिका (सनिर्वेदं नि:श्वस्य) जात! कुतोऽस्माकं सुवर्णव्यवहार:? तातस्य पुनरपि ऋद्ध्या सुवर्णशकटिकया क्रीडिष्यसि। (स्वगतम्‌) तद्यावद्विनोदयाम्येनम्‌। आर्यावसन्तसेनाया: समीपमुपसर्पिष्यामि। (उपसृत्य) आर्य ! प्रणमामि।

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