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Question
“जब ढोल के पास बैठे हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर संध्या समय, किसी दूसरे के कान में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं।”
आपने पढ़ा कि ढोल के पास बैठे व्यक्ति की अपेक्षा दूर बैठे व्यक्ति के लिए ढोल की आवाज़ का अनुभव भिन्न है। अपने अनुभव के आधार पर किसी ऐसी घटना का उल्लेख अपनी डायरी में कीजिए, जब किसी वस्तु, व्यक्ति या संस्था के विषय में दूर से आपका अनुमान कुछऔर रहा हो, पर निकट से आपका अनुभव बिल्कुल अलग रहा हो।
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Solution
गुरुवार, 8 अक्तूबर 2026
आज एक पुरानी घटना याद आई वही जो कहावत की तरह है कि दूर से दिखने वाला सब कुछ मधुर या भयावह, दोनों ही रूपों में भ्रामक हो सकता है। कई साल पहले मैं एक मेला देखने गया था; रास्ते से देखने पर ढोल-नगाड़ों की थाप इतनी आकर्षक और बुलंद लग रही थी कि मन में एक उत्सव-सी भावना ओठों पर मुस्कान ले आई। दूर से सब कुछ सुरम्य, गीत-गूँजता और खुशियों से भरा सा दिखता था ठीक वैसा ही जैसा किसी कहानी में ढोलक की थाप के शोर और नाच-गाने के संदर्भ में मिलता है।
पर जब मैं भीड़ में घुसा, तो अनुभव पूरी तरह बदल गया। पास जाकर ढोल की थाप कानों में इतनी तेज़ और एकरूप लगी कि सुनते-सुनते कान थकने लगे; हर आवाज़ में एक तरह की बेचैनी थी दुकानदारों की हल्ला-गुल्ला, प्लास्टिक की झिल्लियों की खनक, बच्चों की रो-झगड़ और उलझे हुए पथप्रदर्शकों की कुहनी। जो मधुरता दूर से महसूस हुई थी, वह निकट से एक तरह की थकावट और बेचैनी में बदल गई। लोगों के चेहरे पर थकान, पीछे से आने वाली झोंपड़ियाँ और बनावटी सजावट सबने वह आलौकिक छवि भेद दी।
उस दिन मैंने महसूस किया कि दूरी कुछ दोष छुपा देती है और निकटता कुछ श्रृंगार हटा देती है। दूर से किसी चीज़ का सार कैसा भी लगता हो निकट आकर उसके हिस्सों को, उसकी गन्ध, उसकी बनावट, और वहां मौजूद लोगों की असली भाव-स्थिति को समझना ज़रूरी है। तब से मैं किसी भी चीज़ का निर्णय देने से पहले नज़दीक जाकर देखने की कोशिश करने लगा हूँ क्योंकि दूर का संगीत कभी-कभी सिर्फ़ परदे के पीछे छिपा हुआ शोर होता है, और निकटता वह परदा हटा देती है।
यही सब मैंने आज फिर से महसूस किया और लिखकर अपने आप को याद दिलाया कि धैर्य से देखने पर ही सच्चाई नज़र आती है।
