Advertisements
Advertisements
Question
जैहउँ अवध कवन मुहुँ लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई।।
बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं।। नारि हानि बिसेष छति नाहीं।।
भाई के शोक में डूबे राम के इस प्रलाप-वचन में स्त्री के प्रति कैसा सामाजिक दृष्टिकोण संभावित है?
Advertisements
Solution
राम के इस विलापपूर्ण कथन में, जो वे अपने भाई के वियोग के दुःख में कहते हैं, स्त्री के प्रति उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण दिखाई देता है। उस समय समाज पूरी तरह पुरुष-प्रधान था, जहाँ महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त नहीं थे। उन्हें सामाजिक रूप से निम्न और गौण माना जाता था। समाज स्त्री की गरिमा और अस्तित्व को संदेह की दृष्टि से देखता था तथा उसे कमजोर और असहाय समझता था। परिणामस्वरूप, उसके सम्मान और आत्मसम्मान को बार-बार आघात पहुँचाया जाता था।
APPEARS IN
RELATED QUESTIONS
व्याख्या करें-
मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता।
जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहूं। पितु बचन मनतेउँ नहिं ओहू।।
व्याख्या करें-
जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही।।
कालिदास के रघुवंश महाकाव्य में पत्नी (इंदुमती) के मृत्यु-शोक पर अज तथा निराला की सरोज-स्मृति में पुत्री (सरोज) के मृत्यु-शोक पर पिता के करुण उद्गार निकले हैं। उनसे भ्रातृशोक में डूबे राम के इस विलाप की तुलना करें।
