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हमारी सभ्यताएँ आमतौर पर नदियों के किनारे ही फली-फूलीं, लेकिन जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ी तो उन्हें नदियों से दूर जाकर बसना पड़ा, पर वहाँ भी उन्होंने तालाब बनाए। - Hindi Course - A

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Question

निम्नलिखित अपठित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित दिए गए प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर लिखिए:

        हमारी सभ्यताएँ आमतौर पर नदियों के किनारे ही फली-फूलीं, लेकिन जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ी तो उन्हें नदियों से दूर जाकर बसना पड़ा, पर वहाँ भी उन्होंने तालाब बनाए। इन तालाबों की खासियत यह रही कि ये मनुष्यों के साथ-साथ नदियों को भी पोषित करते रहे थे और मानवता को भी पोषित करते थे, क्योंकि तालाबों में भरा पानी नदी के पेट को भरकर नदी को प्रवाह देता था। इसके बाद फिर जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ी, तो हमने कुएँ बनाए, बावड़ियाँ बनाईं। इस तरह जैसे-जैसे मनुष्य को जलस्रोत से दूर जाना पड़ा तो उसने तालाब, बावड़ियाँ, कुएँ, ताल, झाल, पाल आदि बनाकर पानी का संरक्षण किया। इसी कारण हम पानीदार बने रहे, लेकिन जब भारत में अंग्रेज़ी शासक आए तो उन्होंने कहना शुरू किया कि - ‘यह तो सपेरों का देश है और ये ठहरा हुआ पानी पीते हैं। ठहरा हुआ पानी तो दूषित है।’ अंग्रेज़ यह बात नहीं जानते थे कि वर्षा जल शुद्ध और पवित्र होता है और जब वह इकट्ठा होता है तो वह सूर्य की किरणों और हवा के स्पर्श से शुद्ध होता रहता है। यह ज्ञान उन्हें नहीं था। राजस्थान में जो वर्षा का जल इकट्ठा होता था उसे हम ताज़ा पानी कहते थे और अगर किसी को पेट की बीमारी होती थी, तो हम उसी से उसका इलाज कर लिया करते थे।

       हमारे लिए जल सिर्फ़ जीवन देने वाला, जीवन चलाने वाला ही नहीं रहा, बल्कि उसकी एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भूमिका भी रही। हमारी कोई भी पूजा जल के बिना नहीं होती। जब कहीं घूमने या आनंद मनाने जाते हैं, तो नदी किनारे का और उसके बदलते रंगों का आनंद लेते हैं। पूरे दिन में नदी के तीन रंग बदलते हैं। सुबह का अलग, शाम का अलग और दोपहर का अलग। नदी के ये बदलते रंग हमारे जीवन के बदलते रंगों की तरह हैं जिनमें प्रवाह होता है, गति होती है। इस तरह पानी से हमें एक ‘जीवन दर्शन’ मिलता रहा जिसे हम ‘जल दर्शन’ कह सकते हैं। जब तक हमें यह मिलता रहा तब तक हम पानीदार बने रहे, लेकिन अब हमारा यह जल दर्शन शनैः शनैः मिट्टी में दबता जा रहा है।

  1. हमारी सम्यताएँ नदियों के किनारे ही क्यों विकसित हुईं? [1]
    1. जल संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के कारण
    2. बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण
    3. आवागमन की सुविधा के कारण
    4. प्राकृतिक सौंदर्य के कारण
  2. जनसंख्या वृद्धि के साथ जलस्रोतों के विषय में क्या बदलाव आया है? [1]
    1. नदियों पर मनुष्यों की निर्भरता अधिक बढ़ी।
    2. वर्षा जल के लिए प्रतीक्षा रहने लगी।
    3. नदियों से बसावट दूर हुई और तालाब, बावड़ियाँ, कुएँ आदि बनाए गए।
    4. पर्यावरण में प्रदूषण बढ़ने लगा और जलस्रोतों का पानी कम पड़ने लगा।
  3. निम्नलिखित कथन और कारण को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए विकल्पों से सही उत्तर चुनकर लिखिए: [1]
    कथन: हमारी कोई भी पूजा जल के बिना पूरी नहीं होती।
    कारण: जल की मानव जीवन में एक आध्यात्मिक भूमिका रही है।
    विकल्प:
    1. कथन सही है, किंतु कारण ग़लत है।
    2. कथन और कारण दोनों ग़लत हैं।
    3. कथन और कारण दोनों सही हैं और कारण कथन की सही व्याख्या करता है।
    4. कथन और कारण दोनों सही हैं, किंतु कारण कथन की सही व्याख्या नहीं करता है।
  4. जल से जीवन का कौन-सा दर्शन मिलता है? स्पष्ट उत्तर लिखिए। [2]
  5. “पानीदार होने” का गद्यांश के संदर्भ में क्या अर्थ है? हम किस प्रकार पानीदार बने रह सकते हैं? [2]
Comprehension
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Solution

  1. (A) जल संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के कारण
  2. (C) नदियों से बसावट दूर हुई और तालाब, बावड़ियाँ, कुएँ आदि बनाए गए।
  3. (C) कथन और कारण दोनों सही हैं और कारण, कथन की सही व्याख्या करता है।
  4. जल के बदलते रूप हमें जीवन की विविधता का अनुभव कराते हैं। जैसे पानी में सतत प्रवाह और गति रहती है, वैसे ही जीवन में भी सक्रियता बनी रहनी चाहिए। यही ‘जल दर्शन’ अर्थात जीवन का सच्चा दर्शन है।
  5. गद्यांश के अनुसार ‘पानीदार’ बनने का अर्थ है जल के महत्व, उसकी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भूमिका को समझकर उसका सम्मान करना। हमें अपनी पारंपरिक जल संरक्षण पद्धतियों (तालाब, कुएँ आदि) को बनाए रखते हुए जल के प्रति जागरूक और संवेदनशील बनना चाहिए।
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