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Question
“देखो! उन्होंने एक बार भी आकर नहीं पूछा कि तू क्या खाएगा? पूछते तो मैं साबूदाने की खीर ही तो माँगता। कोई ताजमहल तो नहीं माँग लेता। लेकिन नहीं! भूखे रहो!! इससे सारे विकार निकल जाएँगे। विकार निकल जाएँ बस। चाहे इस चक्कर में तुम खुद शिकार हो जाओ।”
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Solution
ये पंक्तियाँ बच्चे की नाराज़गी और मन की कुढ़न को दिखाती हैं। बच्चा सोचकर बीमार हुआ था कि सब उसकी देखभाल करेंगे और उसे खीर, फल जैसी चीज़ें मिलेंगी, जैसा अस्पताल में सुधाकर काका को मिला था। लेकिन उल्टा हुआ; घरवाले खाना खा रहे थे और कोई एक बार भी उससे पूछने तक नहीं आया कि वह क्या खाएगा। “कोई ताजमहल तो नहीं माँग लेता” कहकर बच्चा व्यंग्य करता है कि उसकी माँग तो बहुत छोटी थी, फिर भी किसी ने पूछा नहीं। “चाहे इस चक्कर में तुम खुद शिकार हो जाओ” में बच्चा नानाजी की इस बात पर व्यंग्य करता है कि भूखे रहने से सारे विकार निकल जाते हैं; यानी विकार तो निकल गए, पर बीमारी के नाटक में उसे खुद दिनभर भूखे रहकर अपने नाटक का शिकार बनना पड़ा। इन पंक्तियों से पता चलता है कि बच्चे को अपने झूठे नाटक का सच्चा अनुभव मिल गया और उसे समझ आ गया कि बीमार होना और बीमारों की देखभाल इतनी आसान नहीं होती जितनी सोची जाती है।
