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Question
भावार्थ लिखिए:-
| ॠतु बसंत का सुप्रभात था मंद-मंद था अनिल बह रहा बालारुण की मृदु किरणें थीं अगल-बगल स्वर्णाभ शिखर थे एक-दूसरे से विरहित हो अलग-अलग रहकर ही जिनको सारी रात बितानी होगी, |
Answer in Brief
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Solution
कवी कहते हैं बसंत ऋतु की सुबह धीमी धीमी हवा बह रही है। उगते सूरज की प्रथम मृदु किरणें जो सूर्योदय की प्रथम लाली होती है वह इस शिखर पर पडते ही स्वर्ण कलश की अनुभूति करा रही है। यहाँ चकवा-चकवी के प्रेम रूपी विलाप को पानी के हरी-हरी सतहों पर छिड़ते देखा है। जो चकवा-चकवी रात को बिछड़ जाते हैं।
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बादल को घिरते देखा है
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