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‘आँसुओं को पोंछकर अपनी क्षमता ओं को पहचानना ही जीवन है’, इस सच्चाई को समझाते हुए कविता का रसास्वादन कीजिए । - Hindi

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Question

‘आँसुओं को पोंछकर अपनी क्षमता ओं को पहचानना ही जीवन है’, इस सच्चाई को समझाते हुए कविता का रसास्वादन कीजिए ।

Answer in Brief
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Solution

डॉ. जगदीश गुप्त द्वारा लिखित कविता 'सच हम नहीं, सच तुम नहीं में जीवन में निरंतर संघर्ष करते रहने का आह्वान किया गया है।
कवि पानी-सी बहने वाली सीधी-सादी जिंदगी का विरोध करते हुए संघर्षपूर्ण जीवन जीने की बात करते हैं। वे कहते हैं, जो जहाँ भी हो, उसे संघर्ष करते रहना चाहिए।
संघर्ष में मिली असफलता से निराश होने की आवश्यकता नहीं है। ऐसी हालत में हमें किसी के सहयोग की आशा नहीं करनी। हमें अपने आप में खुद हिम्मत लानी होगी और अपनी क्षमता को पहचान कर नए सिरे से संघर्ष करना होगा। मन में यह विश्वास रखकर काम करना होगा कि हर राही को भटकने के बाद दिशा मिलती ही है और उसका प्रयास व्यर्थ नहीं जाएगा। उसे भी दिशा मिलकर रहेगी।
कवि ने सीधे-सादे शब्दों में प्रभावशाली ढंग से अपनी बात कही है। अपनी बात कहने के लिए उन्होंने 'अपने नयन का नीर पोंछने' शब्द समूह के द्वारा हताशा से अपने आपको उबार कर स्वयं में नई शक्ति पैदा करने तथा 'आकाश सुख देगा नहीं, धरती पसीजी है नहीं से यह कहने का प्रयास किया है कि भगवान तुम्हारी सहायता के लिए नहीं आने वाले हैं और धरती के लोग तुम्हारे दुख से द्रवित नहीं होने वाले हैं। इसलिए तुम स्वयं अपने आप को सांत्वना दो और नए जोश के साथ आगे बढ़ो। तुम अपने लक्ष्य पर पहुँचने में अवश्य कामयाब होंगे।

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रसास्वादन
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Chapter 3: सच हम नहीं; सच तुम नहीं - रसास्वादन [Page 15]

APPEARS IN

Balbharati Hindi Yuvakbharati [English] Standard 12 Maharashtra State Board
Chapter 3 सच हम नहीं; सच तुम नहीं
रसास्वादन | Q 1 | Page 15
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