English

आज के संदर्भ में राम और भरत जैसा भातृप्रेम क्या संभव है? अपनी राय लिखिए। - Hindi (Elective)

Advertisements
Advertisements

Question

आज के संदर्भ में राम और भरत जैसा भातृप्रेम क्या संभव है? अपनी राय लिखिए।

Answer in Brief
Advertisements

Solution

आज के युग में राम और भरत जैसा भातृप्रेम मिलना संभव नहीं है। आज सगे भाइयों में धन-दौलत को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है। भाई-भाई को मारने से बाज़ नहीं आता है। लोगों के लिए संबंधों से अधिक धन प्रिय है। जब तक धन-दौलत की बात नहीं उठती है, रिश्तों में मधुरता विद्यमान रहती है। जहाँ धन आ खड़ा होता है, वहाँ दुश्मनी की विशाल दीवार उत्पन्न हो जाती है। कोई भी अपना हक छोड़ने को तैयार नहीं होता, सबको अपना सुख तथा अपना उज्जवल भविष्य प्यारा होता है। राम के लिए भरत ने और भरत के लिए राम ने राज्य का मोह त्याग दिया। दोनों ने भातृ प्रेम को महत्व दिया और चौदह वर्ष का वनवास भोगा। राम ने घर छोड़कर वन की राह ली और भरत ने अयोध्या में रहते हुए वनवासी का जीवन व्यतीत किया। ऐसा प्रेम तो विरले ही देखने को मिलता है। आज धन-दौलत के नाम पर भाई ने भाई का खून किया इस प्रकार की खबरें पढ़ने में आती है परन्तु भाई ने भाई के लिए अपने प्राण त्याग किए ऐसी खबर कहीं सुनाई भी नहीं देती।

shaalaa.com
भरत-राम का प्रेम
  Is there an error in this question or solution?

RELATED QUESTIONS

'हारेंहु खेल जितावहिं मोही' भरत के इस कथन का क्या आशय है?


'मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ' में राम के स्वभाव की किन विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है?


राम के प्रति अपने श्रद्धाभाव को भरत किस प्रकार प्रकट करते हैं, स्पष्ट कीजिए।


'महीं सकल अनरथ कर मूला' पंक्ति द्वारा भरत के विचारों-भावों का स्पष्टीकरण कीजिए।


'फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली'। पंक्ति में छिपे भाव और शिल्प सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।


भरत के त्याग और समर्पण के अन्य प्रसंगों को जानिए।


निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य सौंदर्य लिखिए।

पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े।

नीरज नयन नेह जल बाढ़े॥

कहब मोर मुनिनाथ निबाहा।

एहि ते अधिक कहौं मैं काहा॥


वियोगावस्था में सुख देने वाली वस्तुएँ भी दुख देने लगती हैं। 'गीतावली' से संकलित पदों के आधार पर सिद्ध कीजिए।


निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।

महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला॥
सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा॥
बिन पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ ऐहि घाएँ॥
बहुरि निहारि निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू॥
अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई॥
जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तापस तीछी॥


निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए -

पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े॥
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा॥
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ॥
मो पर कृपा सनेहू बिसेखी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी॥

भरत का आत्म परिताप उनके व्यक्तित्व के किस पक्ष की ओर संकेत करता है? वर्तमान में ऐसे व्यक्तित्व की आवश्यकता सिद्ध कीजिए।


Share
Notifications

Englishहिंदीमराठी


      Forgot password?
Use app×