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कुछ समय पहले की बात है। मेट्रो रेल में सफर करते समय एक अलग अनुभव हुआ। एक छोटी-सी बच्ची ने अपनी चुलबुली हरकतों से रेल के उस पूरे डिब्बे को खुशनुमा कर रखा था। कभी वह अपने परिवार के लोगों के कहने पर तोतली जुबान में कोई फिल्मी गीत सुनाती,तो कभी किसी गीत के बोल पर ठुमके लगाती। उस डिब्बे में मौजूद लोगों के बीच जहाँ तक उसकी जीवंतता की लहरें पहुँच रही थी, वहाँ तक हर चेहरे पर मुस्कान सज गई थी। निश्चित रूप से उसकी बाल-सुलभ चपलता और हाज़िरजवाबी का आनन्द उठाते सभी चेहरे किसी न किसी गंतव्य तक पहुँचने के लिए ही वहाँ थे या गंतव्य से वापस लौट रहे थे। उनमें नौकरीपेशा वर्ग, विद्यार्थी, गृहणियाँ और उन तमाम वर्गों के लोग शामिल थे, जो अपनी यात्रा के लिए मेट्रो का सफर सुविधाजनक समझते हैं। जाहिर है, सभी के मन मस्तिष्क में कुछ न कुछ चल रहा होगा! यानि समय पर कहीं पहुँचने की फिक्र, पहुँचने के बाद किसी से मिलने या काम करने की फिक्र, ऑफिस या घर के किसी काम की फिक्र आदि। लेकिन उस बच्ची की प्यारी हरकतों ने कुछ समय के लिए उन सब गंभीर विचारों को मस्तिष्क से निकाल कर आसपास खड़े लोगों के बीच अपनी जगह बना ली थी। उसने कुछ क्षणों के लिए हम सबके अन्दर सोए हुए बच्चे को जगा दिया था।
इन सबके बीच केवल एक महोदय का चेहरा था,जो उदास था। ऐसा लग रहा था कि कठोरता की परछाई उन्हें छोड़ कर जाने को बिल्कुल तैयार नहीं थी। मुझे थोड़ा आश्चर्य भी हुआ उनकी उदासीनता पर। शायद कोई परेशानी रही हो,जो उन्हें इस मुस्कान से दूर रखे हुए थी या फिर हो सकता है कि उनका स्वभाव ही ऐसा हो।
एक छोटा बच्चा बहुत कोमल होता है, तन और मन दोनों से वह इतना संवेदनशील होता है कि न्यूनतम प्रेम, भय और दुत्कार को भी भली-भाँति समझता और अनुभव करता है। उसके प्रति अपनी प्रतिक्रिया देता है। लेकिन ज्यों-ज्यों हमारी उम्र बढ़ती जाती है, यह संवदेनशीलता हम सबमें कम होती जाती है। कारण कई हो सकते हैं-पारिवारिक, सामाजिक, मानसिक या आर्थिक । बहुत हद तक हमारा कामकाज का क्षेत्र या व्यवसाय भी इसके लिए उत्तरदायी होता है। उदाहरण के तौर पर जहाँ मनोरंजन और कला के क्षेत्र से जुड़े लोग अपनी संवेदनशीलता को बचाए रख पाने में सक्षम होते हैं, वहीं आज की कठोर दुनिया की कड़वी सच्चाइयों को बटोरते हुए और दिन-रात उसी में माथा खपाते हुए लोग धीरे-धीरे संवेदनशीलता से दूर होते चले जाते हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि हम प्रकृति प्रदत्त इस मानवीय गुण को किस प्रकार सींचें, जिससे यह वक्त और समाज के बेरहम थपेड़ों से कुम्हलाने की बजाय हमेशा हरा-भरा रहे! इसके लिए हमें जरूरत है संवेदनाओं के सम्पर्क में रहने, भावनात्मक साहित्य पढ़ने, ऐसी फिल्में देखने, ऐसे मित्रों के साथ समय बिताने की, जिनके अन्दर बचपन और भावनाएँ अभी तक जीवित हैं। ऐसा संगीत सुनने की जरूरत है, जो हमें याद दिलाए कि हमारे अन्दर भी एक हृदय धड़कता है। वे सब अनुभव, जो कभी हमारे अधरों पर मुस्कान, तो कभी हमारी आँखों में नमी के बादल ला दें,का जिन्दा रहना बहुत जरूरी है।
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