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प्रश्न
‘पुत्र प्रेम’ कहानी में लेखक ने चैतन्यदास के माध्यम से एक ऐसे पिता का चित्रण किया है, जिन्होंने अपने पुत्र-प्रेम की तुलना में अर्थ प्रेम को अधिक महत्त्व दिया। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? कहानी के आधार पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
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उत्तर
यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जा सकता है कि चेतन्यदास के लिए धन के प्रति लगाव, पुत्र-प्रेम से अधिक महत्त्वपूर्ण था। कहानी के अनुसार चेतन्यदास पेशे से एक वकील थे। उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ थी और कई गाँवों में उनकी जमींदारी भी थी। ईश्वर की कृपा से उन्हें दो ऐसे पुत्र प्राप्त हुए थे जो हर दृष्टि से श्रेष्ठ थे। दोनों ही पढ़ाई में तेज़, सामाजिक मर्यादाओं का पालन करने वाले और प्रत्येक कक्षा को प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने वाले थे।
वकील साहब का जीवन विचारशीलता से भरा हुआ था। वे किसी भी समस्या को पहले गहराई से समझते और फिर उस पर कार्य करते थे। वे अर्थशास्त्र के विद्यार्थी रहे थे, इसलिए उनके व्यवहार में तार्किकता और योजनाबद्धता स्पष्ट दिखाई देती थी। धन खर्च करने से पहले वे यह अवश्य सोचते थे कि उससे लाभ किसे होगा। यदि खर्च से उन्हें स्वयं लाभ मिलता, तो वे उसे स्वीकार करते थे, लेकिन यदि उससे किसी अन्य को लाभ पहुँचता, तो वे ऐसे खर्च पर पूरी तरह रोक लगा देते थे।
एक बार उनका बड़ा पुत्र प्रसाद गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। वकील साहब ने पहले अपने परिचित चिकित्सक को दिखाया। लगभग एक महीने तक इलाज चला, पर कोई लाभ नहीं हुआ। इसके बाद विचार-विमर्श कर दूसरे चिकित्सक से उपचार कराया गया और लंबे समय तक इलाज चलता रहा। चिकित्सक ने उसे अन्य स्थान पर इलाज के लिए भेजने का सुझाव भी दिया, लेकिन लंबे उपचार के बाद भी कोई सुधार न होने के कारण वकील साहब को लगा कि केवल आशा के सहारे धन खर्च करना व्यर्थ है।
घर में इस विषय पर काफी बहस हुई, लेकिन किसी ठोस निर्णय पर नहीं पहुँचा जा सका। अंततः वकील साहब ने यह कहकर आगे के इलाज से मना कर दिया कि जब स्थिति में सुधार की संभावना नहीं है, तो केवल उम्मीद के आधार पर इतनी बड़ी राशि खर्च करना उचित नहीं है। इसी कारण इटली जाकर इलाज कराने का प्रयास भी नहीं हो सका। अंततः बीमारी के कारण बालक की मृत्यु हो गई और घर में शोक छा गया। इस घटना से यह सिद्ध हो गया कि चेतन्यदास के लिए अर्थ-प्रेम, पुत्र-प्रेम से भी बढ़कर था।
