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प्रश्न
नीचे दिए गए चिह्नों के सामने उनके नाम लिखिए तथा वाक्यों में उचित विरामचिह्न लगाइए :
| क्र. | चिह्न | नाम | वाक्य |
| १. | - | १. स्त्री शिक्षा को लेकर लेखक के क्या विचार थे | |
| २. | . | २. श्याम तुम आ गए | |
| ३. | __ | ३. मोहन बोला तुमने जो कुछ कहा ठीक है | |
| ४. | [ ] | ४. जीवन संग्राम में सब लड़ रहे हैं कुछ जीतेंगे कुछ हारेंगे | |
| ५. | "......." | ५. भरत भैया ऐसा ना कहो | |
| ६. | , | ६. अरे क्या मैं झूठ बोल रहा हूँ | |
| ७. | ! | ७. जी धन्यवाद | |
| ८. | ; | ८. इसके अलावा तुमने तीन छुट्टियाँ और ली है ठीक है न | |
| ९. | ( ) | ९. अच्छा और इतनी बड़ी बात तुम्हारी मालकिन ने मुझे बताई तक नहीं | |
| १०. | । | १०. आप कह रहे हैं तो आप ने दिए ही होंगे |
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उत्तर
| क्र. | चिह्न | नाम |
| १. | - | योजक चिह्न |
| २. | . | लाघव चिह्न |
| ३. | __ | निर्देशक चिह्न |
| ४. | [ ] | बड़ा कोष्ठक |
| ५. | "......." | दोहरा अवतरण चिह्न |
| ६. | , | अल्प विराम |
| ७. | ! | विस्मयादिबोधक चिह्न |
| ८. | ; | अर्ध विराम |
| ९. | ( ) | कोष्ठक चिह्न |
| १०. | । | पूर्ण विराम |
वाक्य:
१. स्त्री शिक्षा को लेकर लेखक के क्या विचार थे?
२. श्याम, तुम आ गए !
३. मोहन बोला, "तुमने जो कुछ कहा, वह ठीक है।"
४. जीवन संग्राम में सब लड़ रहे हैं; कुछ जीतेंगे, कुछ हारेंगे।
५. भरत भैया, ऐसा ना कहो।
६. अरे! क्या मैं झूठ बोल रहा हूँ ?
७. जी धन्यवाद!
८. इसके अलावा तुमने तीन छुट्टियाँ और ली है। ठीक है न ?
९. अच्छा!... और इतनी बड़ी बात तुम्हारी मालकिन ने मुझे बताई तक नहीं।
१०. आप कह रहे हैं तो आपने दिए ही होंगे।
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रेखांकित शब्द से उपसर्ग और प्रत्यय अलग करके लिखिए:
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| संधि | संधि विच्छेद | संधि का प्रकार |
| ______ | दंत + ओष्ठ |
निर्देशानुसार संधि विच्छेद, संधि तथा उनका नामोल्लेख कीजिए:
| संधि | संधि विच्छेद | संधि का प्रकार |
| दुश्चक्र | ______ + ______ |
परिच्छेद पढ़िए और उसमें आए शब्दों के लिंग एवं वचन बदलकर लिखिए।
|
मैं गाँव से शहर पढ़ने आता था। गाँव का मेरा एक मित्र भी था। सावन-भादों की बादलों से ढँकी रात में बीहड़ पानी बरसता है। पूरा सन्नाटा शेर की दहाड़ सरीखा गरज उठता है। छमाक से बिजलियाँ कड़कती हैं। माँ बच्चे को अपने छाती से चिपकाती है। हाँड़ी में उबलते दाल-भात के साथ उसकी उम्मीद भी पकती है। उसका श्रम पकता है। अंत में कभी-कभी माँ हाँड़ी में चिपके मुट्ठी भर बचे चावल खाती है। न जाने कहाँ से अपनी आँखों में इतनी तेज चमक पैदा कर लेती है कि भरे पेटवाले की आँखें चौंधियाँ जाती हैं। उसके त्याग और संतान की तृप्ति के पानी से उसकी साध लहलहाती है। बैलगाड़ी में बैठी संतान को छतरी की छाँव करती है। बस में बच्चा खिड़की के पास बैठा बाहर दृश्यों को देखता है और वह पूरी यात्रा बच्चे को देखती रहती है। सँभालती रहती है। रेल जब बोगदे के भीतर से गुजरती है, तो अनायास उसका हाथ बच्चे की बाँह पर चला जाता है और पिता का सामान पर। |
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