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प्रश्न
मातृभाषया व्याख्यायन्ताम् –
शरत्काले प्रशस्यन्ते प्रदोषे चेन्दुरश्मयः।
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उत्तर
प्रसंग – प्रस्तुत श्लोकांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘भास्वती प्रथमो-भागः’ के अध्याय ‘ऋतुचर्या’ में से अवतरित है। यह अध्याय महर्षि चरक.द्वारा रचित ग्रन्थ ‘चरकसंहिता’ में से संकलित है। प्रस्तुत अध्याय में महर्षि चरक ने विभिन्न ऋतुओं में अपनी भोजनचर्या को किस प्रकार रखना चाहिए – इस विषय का सुन्दर विवेचन किया है। शरत्काल में क्या-क्या सेवनीय है – इस विषय का वर्णन करते हुए महर्षि कहते हैं –
शरत्काल में रात्रि चन्द्रमा की किरणों का सेवन करना अत्यन्त हितकर होता है। अतः शरदृतु में रात्रि में कुछ समय के लिए चन्द्रमा की किरणों का सेवन अवश्य करना चाहिए।
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अधोलिखितानि विग्रहपदानि आधृत्य समस्तपदानि रचयत –
| विग्रहपदानि | समस्तपदाने | समासनाम |
| हेमन्त: च शिशिर: च | ______ | द्वंद्व समास |
अधोलिखितानि विग्रहपदानि आधृत्य समस्तपदानि रचयत –
| विग्रहपदानि | समस्तपदाने | समासनाम |
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अधोलिखितानि विग्रहपदानि आधृत्य समस्तपदानि रचयत –
| विग्रहपदानि | समस्तपदाने | समासनाम |
| कायस्य अग्निम् | ______ | तत्पुरुष समास |
अधोलिखितानि विग्रहपदानि आधृत्य समस्तपदानि रचयत –
| विग्रहपदानि | समस्तपदाने | समासनाम |
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अधोलिखितपदानामर्थमेलनं क्रियताम –
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| निवातम् | वात |
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प्रकृति प्रत्ययं च योजयित्वा पदनिर्माणं कुरुत –
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प्रकृति प्रत्ययं च योजयित्वा पदनिर्माणं कुरुत –
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प्रकृति प्रत्ययं च योजयित्वा पदनिर्माणं कुरुत –
शरद् + अण् = ______।
