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प्रश्न
मातृभाषया व्याख्यायन्ताम् –
मयूरवैर्जगतः स्नेहं पेपीयते रविः।
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उत्तर
प्रसंग – प्रस्तुत श्लोकांश हमारी पाठ्य-पुस्तक भास्वती – प्रथमो भागः के अध्याय ‘ऋतुचर्या’ में से उद्धृत किया गया है। यह अध्याय महर्षि चरक द्वारा प्रणीत ग्रन्थ ‘चरक संहिता’ में से संकलित है। चरक संहिता आयुर्वेद शास्त्र का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इस अध्याय में महर्षि चरक ने विभिन्न ऋतुओं में अपनी भोजनचर्या किस प्रकार रखनी चाहिए – इस विषय का बहुत सुन्दर विवेचन किया है। ग्रीष्म ऋतु में सूर्य किस प्रकार अपनी किरणों से संसार का स्नेह पीता रहता है – इसका विवेचन किया गया है यहाँ।
सूर्य अपनी तीव्र किरणों से ग्रीष्म ऋतु में जगत के स्नेह को पीता रहता है। सूर्य की गर्म किरणें संसार के रस को पीती रहती हैं अतः इस समय पेय पदार्थों का अधिक सेवन करना चाहिए जिससे शरीर में रस की कमी न होने पाए।
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अधोलिखितानि विग्रहपदानि आधृत्य समस्तपदानि रचयत –
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अधोलिखितानि विग्रहपदानि आधृत्य समस्तपदानि रचयत –
| विग्रहपदानि | समस्तपदाने | समासनाम |
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अधोलिखितानि विग्रहपदानि आधृत्य समस्तपदानि रचयत –
| विग्रहपदानि | समस्तपदाने | समासनाम |
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अधोलिखितानि विग्रहपदानि आधृत्य समस्तपदानि रचयत –
| विग्रहपदानि | समस्तपदाने | समासनाम |
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अधोलिखितपदानामर्थमेलनं क्रियताम –
| पदानि | अर्थाः |
| श्लेष्मा | हवारहित |
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| वासांसि | कफ |
अधोलिखितपदानाम् विपरीतार्थकपदैः सह मेलनं क्रियताम् –
| पदानि | विपरीतार्थकपदानि |
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प्रकृति प्रत्ययं च योजयित्वा पदनिर्माणं कुरुत –
स्निम् + क्त = ______।
प्रकृति प्रत्ययं च योजयित्वा पदनिर्माणं कुरुत –
सेव् + यत् = ______।
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