हिंदी

जीवन में मॉं का स्थान असाधारण है।

Advertisements
Advertisements

प्रश्न

जीवन में मॉं का स्थान असाधारण है।

टिप्पणी लिखिए
Advertisements

उत्तर

बच्चे का जब जन्म होता है, तब सबसे पहले वह अपनी माँ को देखता है। माँ की गोद ही उसकी सारी दुनिया होती है, इसलिए बच्चे अपनी माँ के बहुत करीब होते हैं। माता ही संतान की पहली गुरु होती है। बच्चे को चलना, उठना, बोलना सब उसकी माँ ही सिखाती है। सब दुख-दर्द सहकर भी माँ अपनी संतान की भलाई में लगी रहती है। संतान की बेहतरी के लिए वह अपना सब कुछ त्याग देती है, इसलिए जीवन में माँ का स्थान असाधारण होता है।

shaalaa.com
उपयोजित / रचनात्मक लेखन (लेखन कौशल)
  क्या इस प्रश्न या उत्तर में कोई त्रुटि है?
अध्याय 1.1: सोई मेरी छौना रे ! - सोई मेरी छौना रे ! [पृष्ठ २५]

APPEARS IN

बालभारती Hindi Sulabhbharati [English] Standard 6 Maharashtra State Board
अध्याय 1.1 सोई मेरी छौना रे !
सोई मेरी छौना रे ! | Q (१०) | पृष्ठ २५

संबंधित प्रश्न

मैंने समझा हे मातृभूमि कविता से 


।। जीवन चलता ही रहता।।


इस वर्ष का सूर्यग्रहण कब है? उस समय पशु-पक्षी के वर्तन-परिवर्तन का निरीक्षण करो और बताओ।


चित्र पहचानकर उनके नाम लिखो:

____________


।। ईमानदारी चरित्र निर्माण की नींव है ।।


अपने परिवार का वंश वृक्ष तैयार करो और रिश्ते-नातों के नाम लिखो।


यदि समय का चक्र रुक जाए तो ......


।। करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान ।।


यदि हिमालय की बर्फ पिघलना बंद हो जाए तो .....


निम्नलिखित परिच्छेद पढ़कर इसपर आधारित ऐसे चार प्रश्न तैयार कीजिए. जिनके उत्तर एक-एक वाक्य में हों:

“कोई काम छोटा नहीं। कोई काम गंदा नहीं। कोई भी काम नीचा नहीं। कोई काम असंभव भी नहीं कि व्यक्ति ठान ले और ईश्वर उसकी मदद न करे। शर्त यही है कि वह काम, काम का हो। किसी भी काम के लिए ‘असंभव’, ‘गंदा’ या ‘नीचा’ शब्द मेरे शब्दकोश में नहीं है।” ऐसी वाणी बोलने वाली मदर टेरेसा को कोढ़ियों की सेवा करते देखकर एक बार एक अमेरिकी महिला ने कहा, “मैं यह कभी नहीं करती।” मदर टेरेसा के उपरोक्त संक्षिप्त उत्तर से वह महिला शर्म से सिकुड़ गई थी। सचमुच ऐसे कार्य का मूल्य क्या धन से आँका जा सकता है या पैसे देकर किसी की लगन खरीदी जा सकती है? यह काम तो वही कर सकता है, जो ईश्वरीय आदेश समझकर अपनी लगन इस ओर लगाए हो। जो गरीबों, वंचितों, जरूरतमंदों में ईश्वरीय उपासना का मार्ग देखता हो और दुखी मानवता में उसके दर्शन करता हो। ईसा, गांधी, टेरेसा जैसे परदुखकातर, निर्मल हृदयवाले लोग ही कोढ़ियों और मरणासन्न बीमारों की सेवा कर सकते हैं और ‘निर्मल हृदय’ जैसी संस्थाओं की स्थापना करते हैं।

Share
Notifications

Englishहिंदीमराठी


      Forgot password?
Use app×