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Question
स्थान और समय को ध्यान में रखते हुए दोपहर का भोजन कहानी को विभिन्न दृश्यों में विभाजित करें। किसी एक दृश्य का संवाद भी लिखें।
Very Long Answer
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Solution
- दृश्य 1: रसोई और ओसारा (दोपहर 12:00 बजे)
सिद्धेश्वरी चूल्हा बुझाकर बैठती है। तंग घर में भयंकर गर्मी है। बीमार छोटा बेटा प्रमोद खटोले पर सोया है। - दृश्य 2: बड़ा बेटा रामचंद्र (दोपहर 1:00 बजे)
रामचंद्र काम से थककर घर लौटता है। सिद्धेश्वरी उसे खाना परोसती है और परिवार में शांति बनाए रखने के लिए उससे झूठ बोलती है। - दृश्य 3: मंझला बेटा मोहन (दोपहर 1:45 बजे)
मोहन हाथ-मुँह धोकर चौके में आता है। सिद्धेश्वरी उसे खाना देती है और दोनों भाइयों के बीच आपसी स्नेह का झूठा दिलासा देती है। - दृश्य 4: मुंशी चंद्रिका प्रसाद (दोपहर 2:30 बजे)
नौकरी छूटे पिता (मुंशी जी) भोजन पर बैठते हैं। वे गरीबी छुपाने के लिए इधर-उधर की बातें करते हैं और अंत में रोटी छोड़कर गुड़ का रस माँगते हैं। - दृश्य 5: सिद्धेश्वरी का त्याग (दोपहर 3:15 बजे)
अंत में सिद्धेश्वरी अकेले जूठी थाली लेकर बैठती है। बची हुई इकलौती रोटी में से आधी वह प्रमोद के लिए रख देती है और खुद आधी रोटी खाकर रोने लगती है।
संवाद और मंच-निर्देशन
| स्थान | घर की छोटी और तंग रसोई। बाहर भयंकर लू चल रही है। |
| पात्र |
मुंशी चंद्रिका प्रसाद (कमजोर पिता) और सिद्धेश्वरी (धैर्यवान माँ)।
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(मुंशी जी थके हुए चौके में आते हैं और चटाई पर बैठते हैं। सिद्धेश्वरी उनके सामने दो रोटियाँ और पतली दाल की थाली रखती है।)
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| मुंशी जी | (रोटी तोड़ते हुए) रामचंद्र ने खाना खा लिया? दिखाई नहीं दे रहा। |
| सिद्धेश्वरी | (झूठ बोलते हुए) हाँ, वह खाकर अभी बाहर गया है। नौकरी की बात चल रही है। आपकी बहुत बड़ाई कर रहा था। |
| मुंशी जी | (कमजोर मुस्कान के साथ) लड़का समझदार है। आखिर बेटा किसका है! और मोहन? |
| सिद्धेश्वरी | वह पढ़ रहा है। दोनों भाई एक-दूसरे को बहुत मानते हैं। आप एक और रोटी लीजिए न? अभी बहुत बची हैं। (सिद्धेश्वरी झूठ बोलती है क्योंकि टोकरी में सिर्फ एक आखिरी रोटी बची है)। |
| मुंशी जी | (थाली देखकर तंगी भाँप जाते हैं और हाथ पीछे खींच लेते हैं) नहीं-नहीं, पेट बिलकुल भर गया है! दोपहर में ज्यादा खाना ठीक नहीं होता। |
| सिद्धेश्वरी | (आग्रह करते हुए) अरे, आधी ही ले लीजिए। आधा पेट रहना ठीक नहीं। |
| मुंशी जी: | (बात टालने के लिए हँसते हुए) अरे नहीं भाग्यवान! तुम्हारी कसम, जगह नहीं है। हाँ... अगर थोड़ा गुड़ हो, तो ज़रा गुड़ का ठंडा रस बना दो। हाज़मा अच्छा रहेगा। रोज़ रोटी खाकर मन ऊब गया है। |
| सिद्धेश्वरी | (आँखों में आँसू छुपाकर) अच्छा, अभी लाती हूँ। |
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(मुंशी जी झूठी हँसी हँसते हैं और सिद्धेश्वरी चुपचाप मुँह फेर लेती है। मंच पर अँधेरा होता है।)
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