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सरसुति के भंडार की, बड़ी अपूरब बात। ज्यौं खरचै त्यौं-त्यौं बढ़ै, बिन खरचे घटि जात।। नैना देत बताय सब, हिय को हेत-अहेत। जैसे निरमल आरसी, भली बुरी कहि देत।। अपनी पहुँच बिचारि कै, करतब करिए दौर। - Hindi

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Question

निम्नलिखित पद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:

सरसुति के भंडार की, बड़ी अपूरब बात।
ज्यौं खरचै त्यौं-त्यौं बढ़ै, बिन खरचे घटि जात।।

नैना देत बताय सब, हिय को हेत-अहेत।
जैसे निरमल आरसी, भली बुरी कहि देत।।

अपनी पहुँच बिचारि कै, करतब करिए दौर।
तेते पाँव पसारिए, जेती लाँबी सौर।।

फेर न ह्‌वै हैं कपट सों, जो कीजै ब्यौपार।
जैसे हाँड़ी काठ की, चढ़ै न दूजी बार।।

ऊँचे बैठे ना लहैं, गुन बिन बड़पन कोइ।
बैठो देवल सिखर पर, वायस गरुड़ न होइ।।

उद्यम कबहुँ न छाँड़िए, पर आसा के मोद।
गागरि कैसे फोरिए, उनयो देखि पयोद।।

  1. कारण लिखिए:       (२)
    1. सरस्वती के भंडार को आपूर्व कहा गया है -
    2. व्यापार में दूसरी बार छल-कपट करना असंभव होता है -
  2. उचित मिलान कीजिए:       (२)
    (१) आँखें काठ
    (२) कार्य उद्यम
    (३) लकड़ी नैना
    (४) प्रयत्न करतब 
  3. ‘चादर देखकर पैर फैलाना बुद्धिमानी कहलाती है’ इस विषय परअपने विचार ४० से ५० शब्दों में लिखिए।       (२)
Comprehension
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Solution


    1. सरस्वती का भंडार ऐसा ज्ञान है जो जितना बाँटा जाता है, उतना ही अधिक फैलता है और बढ़ता है। यह लोगों तक पहुँचता रहता है और समाप्त नहीं होता, बल्कि निरंतर विस्तार पाता है। इसी कारण इसे अद्वितीय और विशेष कहा गया है।
    2. व्यापार में यदि पहली बार कोई धोखा दिया जाए, तो सामने वाला व्यक्ति जल्दी ही उसे समझ जाता है। इसके बाद वह सावधान हो जाता है, जिससे दूसरी बार उसे धोखा देना आसान नहीं होता। इसलिए व्यापार में दोबारा कपट करना लगभग नामुमकिन होता है।

  1. (१) आँखें नैना
    (२) कार्य करतब 
    (३) लकड़ी काठ
    (४) प्रयत्न उद्यम
  2. “चादर देखकर पैर फैलाना” का मतलब है कि इंसान को अपनी सामर्थ्य और साधनों के अनुसार ही काम करना चाहिए। यह एक सामान्य आर्थिक सिद्धांत है, जिसे न केवल आम लोग बल्कि बड़ी कंपनियाँ भी अपनाती हैं। जो व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुरूप काम करते हैं, उनका काम सहजता से चलता है। लेकिन जो बिना योजना बनाए या अपनी शक्ति का आकलन किए बिना कार्य शुरू करते हैं, वे बाद में आर्थिक समस्याओं का सामना करते हैं। इसलिए समझदारी इसी में है कि किसी भी काम की शुरुआत से पहले अपनी क्षमता का सही अंदाजा लगाया जाए, ताकि काम आसानी से पूरा हो सके। असली बुद्धिमानी यही है कि संसाधनों को ध्यान में रखकर ही कदम उठाए जाएँ।
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