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“प्रकृति नहीं डरकर झुकती है, कभी भाग्य के बल से, सदा हारती वह मनुष्य के उद्यम से, श्रम जल से। ब्रह्मा का अभिलेख पढ़ा करते निरुद्यमी प्राणी, धोते वीर, कुअंक भाल का बहा भ्रुवों से पानी।” - Hindi (Indian Languages)

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Question

“प्रकृति नहीं डरकर झुकती है, कभी भाग्य के बल से,
सदा हारती वह मनुष्य के उद्यम से, श्रम जल से।
ब्रह्मा का अभिलेख पढ़ा करते निरुद्यमी प्राणी,
धोते वीर, कुअंक भाल का बहा भ्रुवों से पानी।”
  1. कोन किसके सामने नहीं झुकती है?  [1]
  2. ‘निरुद्यमी प्राणी’ शब्दों का प्रयोग किसके लिए किया गया है? वे क्या बहाने बनाते हैं?  [2]
  3. ‘उद्यमी व्यक्ति ही जीवन में हर तरह का सुख-भोग पाते हैं।’ इस कथन को कविता के आधार पर किन्ही चार उदाहरणों द्वारा स्पष्ट कीजिए।  [4]
Very Long Answer
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Solution

  1. प्रकृति कभी भी भाग्य के आगे नहीं झुकती। वह मनुष्य को कर्म करने की प्रेरणा देती है और परिश्रम में ही विश्वास रखती है।
  2. प्रस्तुत शब्द उन आलसी लोगों के लिए प्रयुक्त किया गया है जो मेहनत करने से बचते हैं। ऐसे लोग ब्रह्मा द्वारा लिखे गए भाग्य पर ही भरोसा करते रहते हैं और यह मानते हैं कि बिना प्रयास किए ही उन्हें सफलता प्राप्त हो जाएगी।
  3. कवि के अनुसार मनुष्य जीवन में सुख, सुविधाएँ और इच्छित वस्तुएँ केवल कठिन परिश्रम से ही प्राप्त कर सकता है। यदि ऐसा न होता, तो पृथ्वी अपने भीतर छिपे रत्नों को स्वयं ही बाहर क्यों न निकाल देती? उन्हें पाने के लिए परिश्रम की आवश्यकता क्यों पड़ती? यदि भाग्य ही सब कुछ होता, तो मनुष्य को पूर्वजन्म में संचित धन इस जन्म में स्वतः ही मिल जाना चाहिए था। किंतु वास्तविकता यह है कि मनुष्य पहली बार धन परिश्रम से ही अर्जित करता है। वह उसी घर में जन्म क्यों नहीं लेता जहाँ उसके पूर्वजों ने धन इकट्ठा कर रखा हो? इसका तात्पर्य यह है कि जीवन में सुख-सुविधाएँ और सफलता केवल कर्म और मेहनत के बल पर ही प्राप्त होती हैं।
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