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Question
परिच्छेद पढ़िए और उसमें आए शब्दों के लिंग एवं वचन बदलकर लिखिए।
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मैं गाँव से शहर पढ़ने आता था। गाँव का मेरा एक मित्र भी था। सावन-भादों की बादलों से ढँकी रात में बीहड़ पानी बरसता है। पूरा सन्नाटा शेर की दहाड़ सरीखा गरज उठता है। छमाक से बिजलियाँ कड़कती हैं। माँ बच्चे को अपने छाती से चिपकाती है। हाँड़ी में उबलते दाल-भात के साथ उसकी उम्मीद भी पकती है। उसका श्रम पकता है। अंत में कभी-कभी माँ हाँड़ी में चिपके मुट्ठी भर बचे चावल खाती है। न जाने कहाँ से अपनी आँखों में इतनी तेज चमक पैदा कर लेती है कि भरे पेटवाले की आँखें चौंधियाँ जाती हैं। उसके त्याग और संतान की तृप्ति के पानी से उसकी साध लहलहाती है। बैलगाड़ी में बैठी संतान को छतरी की छाँव करती है। बस में बच्चा खिड़की के पास बैठा बाहर दृश्यों को देखता है और वह पूरी यात्रा बच्चे को देखती रहती है। सँभालती रहती है। रेल जब बोगदे के भीतर से गुजरती है, तो अनायास उसका हाथ बच्चे की बाँह पर चला जाता है और पिता का सामान पर। |
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Solution
मैं गाँव से शहर पढ़ने आती थी। गाँव की मेरी एक सहेली भी थी। सावन-भादों की बादल से ढँकी रात में बीहड़ पानी बरसता है। पूरा सन्नाटा शेरनी की दहाड़ सरीखा गरज उठता है। छमाक से बिजली कड़कती है। पिता बच्चे को अपनी छाती से चिपकाता है। हॉँड़ियों में उबलते दाल-भात के साथ उनकी उम्मीदें भी पकती हैं। उनके श्रम पकते हैं। अंत में कभी-कभी पिता हॉंड़ी में चिपका मुट्ठी भर बचा चावल खाता है। न जाने कहाँ से अपनी आँख में इतनी चमक पैदा कर लेता है कि भरे पेट वालों की आँख चौंधियाँ जाती है।
उनके त्याग और संतान की तृप्ति के पानी से उनकी साध लकलहाती है। बैलगाड़ी में बैठे-संतान को छतरी की छाँव करता है।
बस में बच्ची खिड़की के पास बैठी बाहर दृश्यों को देखती हैं और वह पूरी यात्रा बच्चों को देखता रहता है। सँभालता रहता है। रेल जब बोगदे के भीतर से गुजरती है, तो अनायास उसका हाथ बच्ची की बाँह पर चला जाता है और माता का सामान पर।
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| चिह्न | नाम | वाक्य |
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