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Question
हाकिम शेख की कहानी
हाकिम शेख, पश्चिम बंग खेत मज़दूर समिति (पी. बी. के. एम. एस.) के एक सदस्य थे, जो पश्चिमी बंगाल में खेतिहर मज़दूरों का एक संगठन है। 1992 में एक शाम वे चलती ट्रैन से गिर गए और उन्हें सर में गंभीर चोटें आई. उनकी हलात बहुत नाजुक थी और उन्हें तुरंत इलाज की आवश्यकता थी।
उन्हें कोलकता के एक सरकारी अस्पताल में ले जाया गया, लेकिन उन्हें भर्ती करने से मना क्र दिया गया, क्योंकि वहाँ कोई बिस्तर खाली नहीं था। दूसरे अस्पताल में आवश्यक सुविधाएँ या उनके इलाज के लिए लिए ज़रूरी विशेषज्ञ नहीं थे। इस प्रकार अत्यंत गंभीर हालत में उन्हें घंटे के अंदर आठ सरकारी अस्पतालों में ले जाया गया, किंतु किसी ने भी उन्हें भर्ती नहीं किया।
अंत में उन्हें एक निजी अस्पताल निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया जहाँ उनका इलाज किया गया। उन्होंने अपने इलाज पर बहुत पैसा खर्च किया। जिन अस्पतालों ने उन्हें भर्ती करने से इंकार क्र दिया था, उनके उपेक्षापूर्ण रवैये से नाराज़ और क्षुब्ध होकर, हाकिम शेख एवं पी. बी. के. एम. एस ने कोर्ट में मुकदमा दायर के दिया।
ऊपर दी गई कहानी को पढ़िए। कल्पना कीजिए कि आप एक न्यायाधीश हैं। आप हाकिम शेख को क्या कहेंगे?
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Solution
यदि मैं न्यायाधीश होता तो मैं एक नाजुक और तुरन्त इलाज की आवश्यकता वाले मरीज को उचित समय पर इलाज न किये जाने के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराता। मैं हाकिम का पक्ष लेता क्योंकि उसे अनेक सरकारी अस्पतालों ने उसका इलाज करने से इन्कार कर दिया था। मैं राज्य सरकार से कहता कि हाकिम ने अपने इलाज के लिए निजी-अस्पताल में जो धन खर्च किया है, वह उसे प्रदान करे।
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| पिछले वर्षों में स्वास्थ्य सेवाओं की सुविधा में काफ़ी वृद्धि हुई है। सन् 1950 में भारत में केवल 2,717 अस्पताल थे। सन् 1991 में 11,174 अस्पताल थे और सन् 2017 में यह संख्या बढ़कर 23,583 हो गई। | भारत में करीब पाँच लाख लोग प्रतिवर्ष तपेदिक (टी. बी.) से मर जाते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति से अब तक इस संख्या में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। हर वर्ष मेलरिया के लगभग बीस लाख मामलों की रिपोर्ट प्राप्त होती है यह संख्या कम नहीं हो रही है। |
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