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निराला जी का आतिथ्य भाव स्पष्ट कीजिए। - Hindi

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Questions

निराला जी का आतिथ्य भाव स्पष्ट कीजिए।

निम्नलिखित प्रश्न के उत्तर लगभग ८० से १०० शब्दों में लिखिए:

निराला जी का आतिथ्य भाव स्पष्ट कीजिए।

Explain
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Solution

निराला जी में पारंपरिक आतिथ्य सत्कार की भावना गहराई से रची-बसी थी। वे अपने अतिथि को देवता के समान मानते थे और उनकी सेवा-सुविधा में कोई कमी नहीं छोड़ते थे। वे अपने मेहमान को अपने ही कमरे में ठहराते थे, स्वयं उनके लिए भोजन बनाते थे और जूठे बर्तन भी खुद धोते थे। यदि किसी चीज़ की आवश्यकता होती और वह उनके पास नहीं होती, तो वे अपने मित्रों से उसे उधार लेकर भी अतिथि की सेवा में जुट जाते थे।

हालाँकि निराला जी की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी और उनका कमरा भी साधारण था, फिर भी उनके मन में अतिथियों के लिए गहरी श्रद्धा थी। एक बार जब प्रसिद्ध कवि मैथिलीशरण गुप्त उनके यहाँ आए, तो निराला जी ने स्वयं उनके बिस्तर का बंडल उठाया और दीये की लौ में सीढ़ियाँ दिखाते हुए उन्हें अपने कमरे तक पहुँचाया। वह कक्ष साधनों से भले ही खाली था, पर आत्मीयता और प्रेम से भरा हुआ था। उन्होंने गुप्त जी के लिए नया घड़ा खरीदकर उसमें गंगाजल भरा और उपलब्ध धोती-चादरें बिछाकर उन्हें सम्मानपूर्वक स्थान दिया। निराला जी का अतिथि सत्कार वास्तव में अनोखा और दिल से किया गया था।

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निराला भाई
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Chapter 2: निराला भाई - पाठ पर आधारित लघूत्तरी प्रश्न [Page 10]

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Balbharati Hindi Yuvakbharati [English] Standard 12 Maharashtra State Board
Chapter 2 निराला भाई
पाठ पर आधारित लघूत्तरी प्रश्न | Q 2 | Page 10

RELATED QUESTIONS

लिखिए:

लेखिका के पास रखे तीन सौ रुपये इस प्रकार समाप्त हो गए :

(१) __________________

(२) __________________

(३) __________________

(४) __________________


लिखिए:

अतिथि की सुविधा हेतु निराला जी ये चीजें ले आए :

(१) __________________

(२) __________________

(३) __________________

(४) __________________


‘भाई-बहन का रिश्ता अनूठा होता है’, इस विषय पर अपना मत लिखिए।


‘सभी का आदरपात्र बनने के लिए व्यक्ति का सहृदयी और संस्कारशील होना आवश्यक है’, इस कथन पर अपने विचार लिखिए।


निराला जी की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।


‘निराला’ जी का मूल नाम - ________


निम्नलिखित प्रश्‍न का मात्र एक वाक्य में उत्तर लिखिए:

हिंदी के कुछ आलोचकों द्वारा महादेवी वर्मा को दी गई उपाधि − 


निम्नलिखित प्रश्‍न का मात्र एक वाक्य में उत्तर लिखिए:

हिंदी के कुछ आलोचकों द्वारा महादेवी वर्मा को कौन-सी उपाधि दी गई?


निम्नलिखित गद्यांश पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ पूर्ण कीजिए:

              संयोग से तभी उन्हें कहीं से तीन सौ रुपये मिल गए। वही पूँजी मेरे पास जमा करके उन्होंने मुझे अपने खर्च का बजट बना देने का आदेश दिया। जिन्हें मेरा व्यक्तिगत हिसाब रखना पड़ता है, वे जानते हैं कि यह कार्य मेरे लिए कितना दुष्कर है। न वे मेरी चादर लंबी कर पाते हैं; न मुझे पैर सिकोड़ने पर बाध्य कर सकते हैं; और इस प्रकार एक विचित्र रस्साकशी में तीस दिन बीतते रहते हैं।

              पर यदि अनुत्तीर्ण परीक्षार्थियों की प्रतियोगिता हो तो सौ में दस अंक पाने वाला भी अपने-आपको शून्य पाने वाले से श्रेष्ठ मानेगा।

              अस्तु, नमक से लेकर नापित तक और चप्पल से लेकर मकान के किराये तक का जो अनुमानपत्र मैंने बनाया; वह जब निराला जी को पसंद आ गया, तब पहली बार मुझे अपने अर्थशास्त्र के ज्ञान पर गर्व हुआ। पर दूसरे ही दिन से मेरे गर्व की व्यर्थता सिद्ध होने लगी। वे सवेरे ही पहुँचे। पचास रुपये चाहिए... किसी विद्यार्थी का परीक्षा शुल्क जमा करना है, अन्यथा वह परीक्षा में नहीं बैठ सकेगा। संध्या होते-होते किसी साहित्यिक मित्र को साठ देने की आवश्यकता पड़ गई। दूसरे दिन लखनऊ के किसी ताँगेवाले की माँ को चालीस का मनीऑर्डर करना पड़ा। दोपहर को किसी दिवंगत मित्र की भतीजी के विवाह के लिए सौ देना अनिवार्य हो गया। सारांश यह कि तीसरे दिन उनका जमा किया हुआ रुपया समाप्त हो गया और तब उनके व्यवस्थापक के नाते यह दान खाता मेरे हिस्से आ पड़ा।

(१) संजाल पूर्ण कीजिए: (२)

(२) निम्नलिखित शब्दों के लिए गद्यांश में आए हुए विलोम शब्द लिखिए: (२)

  1. वियोग × ______
  2. उत्तीर्ण × ______
  3. नापसंद × ______
  4. अज्ञान × ______

(३) ‘जीवन में मित्रों का महत्त्व’ इस विषय पर अपने विचार ४० से ५० शब्दों में लिखिए। (२)


निम्नलिखित गद्यांश पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ पूर्ण कीजिए:

बड़े प्रयत्न से बनवाई रजाई, कोट जैसी नित्य व्यवहार की वस्तुएँ भी जब दूसरे ही दिन किसी अन्य का कष्ट दूर करने के लिए अंतर्धान हो गईं तब अर्थ के संबंध में क्या कहा जावे, जो साधन मात्र है। वह संध्या भी मेरी स्मृति में विशेष महत्त्व रखती है जब श्रद्धेय मैथिलीशरण जी निराला जी का आतिथ्य ग्रहण करने गए।

बगल में गुप्त जी के बिछौने का बंडल दबाए, दियासलाई के क्षण प्रकाश, क्षीण अंधकार में तंग सीढ़ियों का मार्ग दिखाते हुए निराला जी हमें उस कक्ष में ले गए जो उनकी कठोर साहित्य साधना का मूक साक्षी रहा है।

आले पर कपड़े की आधी जली बत्ती से भरा पर तेल से खाली मिट्टी का दीया मानो अपने नाम की सार्थकता के लिए जल उठने का प्रयास कर रहा था।

वह आलोकरहित, सुख-सुविधा शून्य घर, गृहस्वामी के विशाल आकार और उससे भी विशालतर आत्मीयता से भरा हुआ था। अपने संबंध में बेसुध निराला जी अपने अतिथि की सुविधा के लिए सतर्क प्रहरी हैं। अतिथि की सुविधा का विचार कर वे नया घड़ा खरीदकर गंगाजल ले आए और धोती-चादर जो कुछ घर में मिल सका; सब तख्त पर बिछाकर उन्हें प्रतिष्ठित किया।

तारों की छाया में उन दोनों मर्यादावादी और विद्रोही महाकवियों ने क्या कहा-सुना, यह मुझे ज्ञात नहीं पर सवेरे गुप्त जी को ट्रेन में बैठाकर वे मुझे उनके सुख शयन का समाचार देना न भूले।

ऐसे अवसरों की कमी नहीं जब वे अकस्मात पहुँचकर कहने लगे-मेरे इक्के पर कुछ लकड़ियाँ, थोड़ा घी आदि रखवा दो। अतिथि आए हैं, घर में सामान नहीं है।

  1. संजाल पूर्ण कीजिए:      [2]

  2. निम्नलिखित शब्दों के लिए गद्यांश में आए हुए समानार्थी शब्द ढूँढ़कर लिखिए:    [2]
    1. मेहमान - ______
    2. प्रयास - ______
    3. शाम - ______
    4. दीपक - ______
  3. 'आतिथ्य भाव' हमारे संस्कार हैं, इस विषय पर अपने विचार ४० से ५० शब्दों में लिखिए।    [2]

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