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निचे दिए गए विषय पर निबन्ध लिखिए जो लगभग 400 शब्दों से कम न हो: “मनुष्य के नैतिक उत्थान का जिम्मेदार परिवार एवं समाज है” - विषय के पक्ष या विपक्ष में अपने विचार व्यक्त कीजिए। - Hindi (Indian Languages)

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Question

निचे दिए गए विषय पर निबन्ध लिखिए जो लगभग 400 शब्दों से कम न हो:

“मनुष्य के नैतिक उत्थान का जिम्मेदार परिवार एवं समाज है” - विषय के पक्ष या विपक्ष में अपने विचार व्यक्त कीजिए।

Writing Skills
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Solution

मनुष्य के नैतिक उत्थान में परिवार एवं समाज की भूमिका

प्रस्तावना

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। जन्म के समय वह एक कोरी स्लेट के समान होता है, जिस पर संस्कार और नैतिकता के अक्षर परिवार और समाज द्वारा लिखे जाते हैं। ‘नैतिकता’ वह प्रकाश पुंज है जो व्यक्ति को उचित और अनुचित, सत्य और असत्य तथा धर्म और अधर्म के बीच भेद करना सिखाती है। किसी भी व्यक्ति का चारित्रिक और नैतिक उत्थान शून्य में नहीं होता; इसके पीछे उसके परिवेश का बहुत बड़ा हाथ होता है।

परिवार: प्रथम पाठशाला

बच्चे की पहली गुरु उसकी माँ और पहला विद्यालय उसका परिवार होता है। नैतिकता का पाठ किसी पुस्तक से उतना नहीं सीखा जाता, जितना परिवार के सदस्यों के व्यवहार को देखकर सीखा जाता है। यदि परिवार में बड़े-बुजुर्गों का सम्मान होता है, सत्य बोला जाता है और आपसी प्रेम बना रहता है, तो बच्चा स्वाभाविक रूप से इन गुणों को आत्मसात कर लेता है।

  • अनुशासन और संस्कार: परिवार ही वह स्थान है जहाँ बच्चा ‘त्याग’ और ‘साझा करने’ की भावना सीखता है।
  • नैतिक मूल्यों का बीजारोपण: माता-पिता द्वारा सुनाई गई कहानियाँ और उनके द्वारा दिए गए निर्देश बालक के अवचेतन मन में बैठ जाते हैं। यदि परिवार ही अनैतिक कार्यों में लिप्त हो, तो बालक से नैतिक होने की अपेक्षा करना व्यर्थ है।

समाज: व्यक्तित्व का विस्तार

जैसे ही बालक परिवार की चौखट लांघता है, वह समाज के संपर्क में आता है। विद्यालय, मित्र मंडली और अड़ोस-पड़ोस उसके नैतिक विकास की दूसरी सीढ़ी हैं। समाज एक दर्पण की तरह है; व्यक्ति जैसा देखता है, वैसा ही बनने की कोशिश करता है।

  • सामूहिक उत्तरदायित्व: जब समाज ईमानदारी को पुरस्कृत करता है और भ्रष्टाचार या अनैतिकता की निंदा करता है, तो व्यक्ति में नैतिक बने रहने का प्रोत्साहन जागता है।
  • सांस्कृतिक प्रभाव: हमारे त्योहार, सामाजिक रीति-रिवाज और लोक-कथाएँ हमें अपनी जड़ों से जोड़ते हैं और परोपकार की भावना सिखाते हैं। एक स्वस्थ समाज ही एक सुसंस्कृत नागरिक का निर्माण कर सकता है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य और चुनौतियाँ

आज के भौतिकवादी युग में परिवार छोटे होते जा रहे हैं और सामाजिक ताना-बाना बिखर रहा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में बाहरी प्रभाव नैतिक मूल्यों पर प्रहार कर रहे हैं। ऐसे में परिवार और समाज की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। यदि माता-पिता अपने बच्चों को समय नहीं देंगे या समाज अनैतिकता के प्रति उदासीन हो जाएगा, तो मनुष्य का नैतिक पतन निश्चित है।

उपसंहार

अंततः, यह निर्विवाद है कि मनुष्य के नैतिक उत्थान का मुख्य श्रेय परिवार और समाज को ही जाता है। व्यक्ति वह पौधा है जिसे परिवार रूपी जड़ से पोषण मिलता है और समाज रूपी वातावरण उसे पल्लवित होने का अवसर देता है। यदि ये दोनों अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाएं, तो एक आदर्श चरित्र वाले समाज का निर्माण संभव है। जैसा कि कहा गया है, “संस्कारवान परिवार और मर्यादित समाज ही राष्ट्र की असली शक्ति हैं।”

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