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नि:स्वार्थ भाव से की गई सहायता से असीम आनंद तथा संतोष प्राप्त होता है। किसी ऐसी ही एक घटना का वर्णन कीजिए जब आपने अपनी परेशानियों की परवाह किए बिना किसी ज़रूरतमंद व्यक्ति की मदद की थी। - Hindi (Indian Languages)

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Question

निचे दिए गए विषय पर निबन्ध लिखिए जो लगभग 400 शब्दों से कम न हो:

नि:स्वार्थ भाव से की गई सहायता से असीम आनंद तथा संतोष प्राप्त होता है। किसी ऐसी ही एक घटना का वर्णन कीजिए जब आपने अपनी परेशानियों की परवाह किए बिना किसी ज़रूरतमंद व्यक्ति की मदद की थी। यह भी स्पष्ट कीजिए कि इस अनुभव से आपके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा?

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Solution

निःस्वार्थ सेवा

सच है कि निःस्वार्थ भाव से की गई सहायता से असीम आनन्द तथा संतोष प्राप्त होता है। उत्कृष्ट धर्म है मानव सेवा अथवा मानवता धर्म।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा है-

“परहित सरिस धर्म नहिं भाई, 
  पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।”

निःस्वार्थ भाव से सेवा करना। अपने हित की चिंता न करते हुए जब व्यक्ति दूसरों की सहायता करता है तो उसे आत्मिक शांति मिलती है और हृदय निर्मल हो जाता है।

आज भी जब मैं उस घटना को याद करता हूँ तो दिल को सुकून मिलता है। बात उन दिनों की है, जब मैं दसवीं कक्षा में था। हमारे परिवार में हम चार लोग थे। माताजी, पिताजी, मेरी बड़ी बहन ऑचल और मैं। घर का काम-काज करने के लिए लीला बाई आती थीं। मुझे प्रति माह पाँच सौं रुपए पॉकेट मनी के रूप मैं मिलतैं थें। जीवन नियमित क्रम से चल रहा था। माता-पिता दोनों आई-टी कम्पनी में कार्यरत थे।

स्कूल से आते ही माँ को आवाज़ न लगाकर लीला बाई को ही आवाज़ लगाता। वे मेरा अच्छा ख्याल रखती थीं। यह साल हमारे लिए मुख्य था। बोर्ड की परीक्षा की तैयारी करनी थी। मेरी जार मोटा चश्मा लगा था। एक बार यह चश्मा टूट गया। माँ ने पैसे भी दिए, नया चश्मा लाने के लिए। संयोग से लीला बाई का लड़का भी दसवीं कक्षा में था। उस दिन लीला बाई बहुत उदास थीं। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि उनके लड़के को स्कूल से निकाल दिया गया था। पिछले तीन महीनों से वह फीस नहीं भर पाई थी। सारा पैसा बीमार पति की देखभाल में लग जाता है।

उनकी बाते सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा। वह माँ से रुपए मांगने में थीं। पहले ही बीस हजार रुपए ले चुकी थीं। मैंने अपना पर्स टटोला। पाया कि उसमें नया चश्मा लाने के लिए जो पैसे मिले थे, वे वहीं पर थे। चश्मा लाना भी जरूरी था, पर मैंने लीला बाई की मदद करने का निश्चय किया। मैंने उस टूटे चश्मे को जैसे-तैसे जोड़कर बहना शुरू किया। माँ ने जो पैसे दिए, और मेरी पॉकेट मनी से मैंने लीलाबाई के बेटे की फीस भरी। वह खुशी-खुशी स्कूल जाने लगा।

भले ही यह बात मैंने अपने पिताजी तथा माँ से छुपाई पर बोर्ड की परीक्षाओं के बाद सारी बात बताई, तो माँ खुश हो गईं और उज्ज्वल भविष्य के लिए आशीर्वाद भी दिया। उन्होंने मुझसे कहा कि दूसरों की सहायता करने से जैसा सुकून मिलता है, वैसी खुशी किसी और से नहीं। माँ ने ही मुझे नया चश्मा लाकर दिया। मैंने भी बात छिपाने की गलती के लिए माफी माँगी।

मित्रों, इस तरह लीला बाई की मदद करके मुझे असीम आनन्द की अनुभूति हुई, जीवन की सार्थकता का अनुभव हुआ। जीवन की संतुष्टि इसी में है। हम अपने छोटे-छोटे कृत्यों से दूसरों की मदद कर सकते हैं। आज मैं कक्षा बारह का छात्र हूँ। अपनी पढ़ाई के साथ-साथ चार गरीब बच्चों को पढ़ाता हूँ और उनकी फीस का इंतजाम भी करता हूँ। मेरे इस कार्य से प्रेरित होकर मेरा मित्र भी इस कार्य में मेरा सहयोग देता है।

सच है कि निस्वार्थ सेवा ही सच्ची सेवा है, उसके सामने सब सुख फीके हैं। परोपकार का कार्य करने के बाद जिस आनंद की अनुभूति होती है उस विषय में कवि रहीम ने ठीक ही लिखा है-

“यों रहीम सुख होत है उपकारी के संग।
  बाटन वारे को लगे ज्यों मेंहदी को रंग।।”

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