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Question
नामतालिकां पूरयत।
| ए.व. | द्विव. | ब.व. | विभक्तिः |
| ______ | ऋत्विग्भ्याम् | ______ | तृतीया |
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Solution
| ए.व. | द्विव. | ब.व. | विभक्तिः |
| ऋत्विजा | ऋत्विग्भ्याम् | ऋत्विग्भिः | तृतीया |
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माध्यमभाषया सरलार्थं लिखत।
मनुजा वाचनेनैव बोधन्ते विषयान् बहून्।
दक्षा भवन्ति कार्येषु वाचनेन बहुश्रुताः।।
माध्यमभाषया सरलार्थं लिखत।
सर्वं व्याप्नोति सलिलं शर्करा लवणं यथा।
एवं मानवताधर्मो धर्मान् व्याप्नोति सर्वथा।।
पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत।
सकला नद्यः कं प्रविशन्ति?
पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत।
सङ्गीते स्वराः कीदृशाः?
पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत।
कः सर्वधर्मान् व्याप्नोति?
पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत।
भानुः कं प्रकाशयति?
पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत।
कां भज इति कविः वदति?
सन्धिविग्रहं कुरुत।
भानुर्भुवनमण्डलम् = ______ + भुवनमण्डलम्।
सन्धिविग्रहं कुरुत।
प्रकाशयत्येकस्तथा = ______ + ______ + तथा।
सन्धिविग्रहं कुरुत।
व्यवहरेल्लोके = ______ + लोके।
सन्धिविग्रहं कुरुत।
एषोऽभ्युदयकृत् = एषः + ______।
पाठात् ल्यबन्त-अव्ययानि चित्वा लिखत।
सूचनानुसारं कृती: कुरुत।
सर्वधर्मान् परित्यज्य ध्रुवं मानवतां भज। (पूर्वकालवाचकं निष्कासयत।)
सूचनानुसारं कृती: कुरुत।
त्वं सर्वधर्मान् परित्यज्य मानवतां भज। (‘त्वं’ स्थाने ‘भवान्’ योजयत।)
सूचनानुसारं कृती: कुरुत।
भानुः भुवनमण्डलं प्रकाशयति। (णिजन्तं निष्कासयत।)
समानार्थकशब्दमेलनं कुरुत।
(१) सरि (२) रङ्गः (३) अम्भः (४) दिनकृत् (५) मार्गः
(अ) वण (आ) भानुः (इ) नदी (ई) पन्थाः (उ) सलिलम्
माध्यमभाषया उत्तरं लिखत।
मानवताधर्मः अभ्युदयकृत् कथं वर्तते?
माध्यमभाषया उत्तरं लिखत।
कदा मानवता भवेत्?
माध्यमभाषया उत्तरं लिखत।
‘मानवताधर्मः’ इति काव्यस्य आधारेण मानवताधर्मस्य वर्णनं कुरुत।
पृथक्करणं कुरुत।
| नाम | सर्वनाम |
(मञ्जूषा - मम, राजा, एतौ, साधवः)
पृथक्करणं कुरुत।
| नाम | सर्वनाम |
(मञ्जूषा - शाखी, वयम्, पिता, ताः)
पृथक्करणं कुरुत।
| नाम | सर्वनाम |
(मञ्जूषा - कस्मै, यया, रथैः तीरे)
पृथक्करणं कुरुत।
| क्रियापदम् | धातुसाधित-विशेषणम् |
(मञ्जूषा - त्यजतु, हतः, अब्रूत, पीतः)
पृथक्करणं कुरुत।
| क्रियापदम् | धातुसाधित-विशेषणम् |
(मञ्जूषा - भेतव्यम्, जानाति, ददाति, मुक्तः)
नामतालिकां पूरयत।
| ए.व. | द्विव. | ब.व. | विभक्तिः |
| ______ | ______ | स्रग्भ्यः | चतुर्थी |
माध्यमभाषया सरलार्थं लिखत।
एकीभूय यथा सर्वे वर्णा गच्छन्ति शुक्लताम्।
तथा सम्भूय शंसन्ति धर्मा मानवतागुणम्।।
