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Question
निम्नलिखित अवतरण को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:-
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“मैं जानता था, तुम वहाँ नहीं जा सकोगी और जाने से भी क्या होता है। जब तुम उस नीची श्रेणी की विजातीय भाभी को घर नहीं ला सकती, तब तक प्रेम और ममता की दुहाई व्यर्थ है। तुम सब निर्मम हो निर्मम...।” संस्कार और भावना - विष्णु प्रभाकर |
- प्रस्तुत कथन का वक्ता कौन है? ‘तुम वहाँ नहीं जा सकोगी’ ऐसा वक्ता ने श्रोता से क्यों कहा? [2]
- ‘विजातीय’ शब्द किसकी ओर संकेत करता है? उसका परिचय दीजिए। [2]
- ‘प्रेम और ममता की दुहाई व्यर्थ है’ - यह पंक्ति किस संदर्भ में कही गई है? श्रोता किन संस्कारों के बंधन में जकड़ी हुई थी? [3]
- ‘संस्कार एवं भावना’ एकांकी से हमें क्या शिक्षा प्राप्त होती है? आज के समाज के संदर्भ को ध्यान में रखते हुए अपने विचार लिखिए। [3]
Comprehension
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Solution
- प्रस्तुत कथन का वक्ता अतुल है। अतुल ने अपनी माँ (श्रोता) से ऐसा इसलिए कहा क्योंकि वह जानता था कि उसकी माँ पुराने, रूढ़िवादी संस्कारों और जाति-पाँति की बेड़ियों में जकड़ी हुई हैं। माँ के मन में अपने बड़े बेटे (अविनाश) के प्रति ममता तो थी, लेकिन समाज और जाति के झूठे गौरव के कारण वे अपने कदम उस घर की ओर नहीं बढ़ा सकती थीं जहाँ उनकी ‘विजातीय’ बहू रहती थी।
- ‘विजातीय’ शब्द अतुल की बड़ी भाभी (अविनाश की पत्नी) की ओर संकेत करता है। वह एक दूसरे समुदाय या जाति की स्त्री है, जिससे अतुल के बड़े भाई अविनाश ने परिवार की इच्छा के विरुद्ध विवाह किया था। इसी कारण माँ ने उन्हें घर से अलग कर दिया था। वह एक पढ़ी-लिखी और सेवाभावी स्त्री है, जो अपने पति की बीमारी में जी-जान से सेवा करती है।
- यह पंक्ति तब कही गई है जब माँ अपने बीमार बेटे (अविनाश) के लिए दुखी हो रही थीं और अपनी ममता प्रकट कर रही थीं। अतुल उन्हें आईना दिखाते हुए कहता है कि यदि वे अपनी बहू को स्वीकार नहीं कर सकतीं और उसे घर नहीं ला सकतीं, तो उनका यह ऊपरी प्रेम और ममता दिखावा मात्र है। श्रोता (माँ) पुराने रूढ़िवादी संस्कारों, छुआछूत, ऊँच-नीच और जातिगत भेदभाव के बंधनों में जकड़ी हुई थीं। उन्हें डर था कि एक विजातीय बहू को घर में स्थान देने से उनके कुल की पवित्रता नष्ट हो जाएगी और समाज में उनका अपमान होगा।
- यह एकांकी हमें सिखाती है कि मानवीय भावनाएँ (प्रेम और करुणा), रूढ़िवादी संस्कारों से कहीं ऊपर होती हैं। सच्चे संस्कार वे हैं जो परिवार को जोड़ें, न कि वे जो जाति के नाम पर अपनों को अपनों से अलग कर दें। मानवता का धर्म ही सबसे बड़ा धर्म है। आज के आधुनिक समाज में शिक्षा के प्रसार से जातिगत दीवारें कमजोर तो हुई हैं, लेकिन मानसिक संकीर्णता अभी भी कहीं-कहीं मौजूद है। आज के समय में हमें ‘भावना’ को ‘संस्कार’ पर प्राथमिकता देनी चाहिए। परिवार की एकता और आपसी प्रेम किसी भी सामाजिक मर्यादा या जातिगत गर्व से अधिक मूल्यवान हैं।
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